फर्जी/अस्तित्वहीन फर्मों के सत्यापन में सामने आई गड़बड़ियां, जांच का दायरा बढ़ाने की जरूरत; आखिर इतनी बड़ी गतिविधि समय रहते पकड़ में क्यों नहीं आई?
रायपुर। राजधानी रायपुर में सामने आए कथित जीएसटी फर्जीवाड़े ने कारोबार के साथ-साथ विभागीय निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। अगस्त्य इंटरप्राइजेस के संचालक अमन अग्रवाल के खिलाफ पुलिस ने FIR दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। जीएसटी विभाग की जांच में कंपनी द्वारा अलग-अलग फर्मों के जरिए करीब 141.74 करोड़ रुपये का कारोबार दिखाने और 23.43 करोड़ रुपये की इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) का दावा करने की बात सामने आई है।

अमन अग्रवाल के खिलाफ FIR दर्ज..
मृत व्यक्ति के नाम से बना किरायानामा
मामले की जांच में सबसे चौंकाने वाली बात एक किरायानामे को लेकर सामने आई। जीएसटी विभाग के सत्यापन में बताया गया कि जिस फूल सिंह के नाम पर किरायानामा लगाया गया था, उसकी वर्ष 2010 में मृत्यु हो चुकी थी, जबकि संबंधित किरायानामा 21 मार्च 2025 का बताया गया है। यानी दस्तावेज तैयार किए जाने के समय संबंधित व्यक्ति जीवित नहीं था।
इसके अलावा जांच में कुछ ऐसी फर्मों का भी सत्यापन किया गया, जिनके नाम पर करोड़ों रुपये का कारोबार दिखाया गया था। कई फर्मों के पते पर भौतिक सत्यापन के दौरान फर्म नहीं मिलीं और कुछ लोगों ने संबंधित कारोबार से ही इनकार किया।
चाय वाले, मजदूर और नौकरी करने वालों के नाम पर करोड़ों का कारोबार
जांच में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक अंसारी ट्रेडर्स से 30.71 करोड़, ललित ट्रेड लिंक से 29.72 करोड़, अगस्त इंटरप्राइजेस से 22.47 करोड़, विनायक वेंचर्स से 17.95 करोड़, हुसैनी इंटरप्राइजेस से 16.61 करोड़, महावीर इंटरप्राइजेस से 12.67 करोड़ और यूनिक इंटरप्राइजेस से 11.61 करोड़ रुपये का कारोबार दिखाया गया। इन लेन-देन के आधार पर अलग-अलग ITC का दावा किया गया।
रिपोर्ट के अनुसार कुछ फर्मों से जुड़े लोगों ने कारोबार से संबंध होने से इनकार किया। एक व्यक्ति के बारे में बताया गया कि वह पार्किंग में नौकरी करता था, जबकि एक अन्य के पूर्व में चाय का ठेला लगाने की जानकारी सामने आई
अब सबसे बड़ा सवाल: इतनी बड़ी गतिविधि पर निगरानी कैसे नहीं हुई?
यह मामला सिर्फ एक कारोबारी के खिलाफ दर्ज FIR तक सीमित नहीं रहना चाहिए—जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी हो सकता है कि इतने बड़े लेन-देन और ITC दावों के बावजूद संबंधित फर्मों का सत्यापन और निगरानी समय रहते क्यों नहीं हुई?
यदि विभागीय जांच में अब फर्जी या अस्तित्वहीन फर्में सामने आ रही हैं, तो यह भी जांच का विषय हो सकता है कि इन फर्मों का GST पंजीयन, दस्तावेजों का सत्यापन, कारोबार की वास्तविकता और करोड़ों रुपये के लेन-देन की निगरानी किस स्तर पर हुई थी?
और सबसे अहम सवाल—क्या इस पूरे नेटवर्क में केवल अमन अग्रवाल की भूमिका थी, या जांच में अन्य लोगों की भूमिका भी सामने आएगी?
अधिकारियो की भूमिका पर सवाल ?
“इतने बड़े कथित जीएसटी फर्जीवाड़े में अमन अग्रवाल के खिलाफ FIR दर्ज हो गई है, लेकिन अब जांच का दायरा इस सवाल तक भी पहुंचना चाहिए कि करोड़ों रुपये के लेन-देन और ITC दावों की निगरानी के बावजूद यह मामला समय रहते पकड़ में क्यों नहीं आया। क्या सत्यापन प्रक्रिया में कहीं चूक हुई, या किसी स्तर पर लापरवाही बरती गई? यदि जांच में किसी अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका सामने आती है, तो उस पर भी कार्रवाई होगी या नहीं—यह भी जांच का विषय है।”इंदर कोटवानी

