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मुरूम के अवैध खनन: माईनिग अफसरों से मिलकर माफिया राजस्व को लगा रहे चूना,

तिल्दा नेवरा पत्रिका न्यूज़ फोटो

शहर से लगे गावों में  धड़ल्ले से अवैध खनन का खेल चल रहा है।खनन माफियाँ गाव और जंगलों में अपनी नजर गड़ाए हुए हैं। रोजना  बड़ी मात्रा में मुरुम का खनन कर परिवजन किया जा रहा है। ऐसे तो अवैध खनन का खेल लंबे समय से चल रहा है।लेकिन विधान चुनाव के बीच तेजी से  शुरू हुआ अवैध खनन का खेल अधिकारियो से मिलीभगत से बिना डर भय के दिन रात धड़ल्ले से चल रहा है।

अवैध मुरूम उत्खनन से पर्यावरण को भी खतरा उत्पन्न हो रहा है।अवैध खुदाई के भरोसे ही मुरूम की आपूर्ति हो रही है। लेकिन खनिज विभाग लगातार गंभीर होती जा रही इस समस्या से मुंह मोड़ रहा है।

सड़क और भवन का निर्माण मुरूम के बिना पूरा नहीं होता। सरकारी और निजी निर्माण कार्य में बड़े पैमाने में मुरूम का उपयोग रोजाना किया जा रहा है। जबकि शहर के आसपास एक भी मुरूम खदान का लीज नहीं है। मुरूम की आपूर्तिकर्ताओं द्वारा आंख मुंद कर ऊंचे टीले की खुदाई की जा रही है। वन भूमि के साथ ग्रामीण क्षेत्रों के आवासीय इलाकों पास मुरूम की अवैध खुदाई से बड़े-बड़े गड्ढे बन गए हैं। बारिश के मौसम में इन गड्ढों में पानी जमा हो जाने से बच्चों के साथ मवेशियों के गिरने का खतरा बना रहता है।

पिछले 25 दिनों से तिल्दा के पास के गाव कोहका कोटा,और घुलघुल में खले आम अवैध उत्खनन किया जा रहा है,अवैध मुरुम कि खुदाई में 2 से अधिक जेसीपी लगी हुई है,वही ढूलाई के आधा दर्जन से अधिक हैव लगे हुए है.ये मुरुम तिल्दा रलवे ओव्हर ब्रिज के बन रही एक कालोनी में गिरे जा रही है,बताया जाता है कि 25 दिनों में 1 हजार से भी अधिक  हाईवा मुरम कि खुदाई कर कालोनी के अंदर गिराई जा चुकी है, चर्चा है कि खनिज विभाग के अधिकारियों को अवैध रूप खनन कि जा मुरुम के एवज में 25 लाख रुपयों से भी अधिक की लेन देन की गई है,यही करण है कि खनिज विभाग के अधिकारयो ने पूरी तरह आंख मूंद रखे हैं।स्थानीय राजस्व विभाग के अधिकारयो को भी माफियाँ के द्वरा सेट करने बात कही जा रही है, मुरूम की आपूर्ति का काम अधिकाशंतः ट्रैक्टर चालकों द्वारा किया जाता है। सड़क निर्माण के लिए ठेकेदारों द्वारा भी जेसीबी की मदद से बड़े पैमाने में मुरूम का उत्खनन किया जाता है। उत्खनन के दौरान संबंधित ठेकेदार अपनी सुविधा के अनुसार कहीं भी गड्ढे खोद देते हैं।

लीज के लिए गुजरना होगा कई प्रक्रियाओं से
अगर कोई प्रक्रिया के तहत मुरूम खदान संचालन की अनुमति लेने के लिए तैयार भी हो जाता है, तो उसे कई तरह के खानापूर्ति करनी पड़ेगी। सबसे बड़ी बाधा पर्यावरण विभाग से अनापत्ति प्राप्त करने की हो सकती है। विभाग से अनुमति प्राप्त करने के लिए कागजी खाना पूर्ति करने के साथ आवेदक को राजधानी की दौड़ भी लगानी पड़ती है। बताया जाता है कि इन सब चक्कर में फंसने के लिए कोई तैयार नहीं है। खासकर उस स्थिति में जब लोगों को अवैध रुप से मुरूम आसानी से उपलब्ध हो जा रहा है।

विभाग को नहीं मिल रहे हैं ठेकेदार
जिले में मुरूम खदान को लेकर खनिज विभाग की भी अपनी परेशानी है। विभाग के अधिकारियों का कहना है कि लाख प्रयास करने के बाद भी उन्हें खदान संचालित करने के लिए कोई नहीं मिल रहा है। वहीं जानकारों के मुताबिक खनिज विभाग अगर मुरूम के अवैध उत्खनन पर कड़ाई से रोक लगा दे, तो मुरूम का खदान आसानी से खोला जा सकता है। हकीकत यह है कि मुरूम खदान के लिए खनिज विभाग के अधिकारियों ने अब तक गंभीरता से प्रयास नहीं किया है। विभाग ने न तो इसके लिए कभी इश्तेहार जारी किया और न ही अवैध उत्खननकर्ता के विरूद्व कड़ी कानूनी कार्रवाई की है।

शासन को रायल्टी का हो रहा नुकसान
मुरूम खदान नहीं होने का खामियाजा शासन के साथ सरकारी निर्माण कार्य में संलग्न ठेकेदारों को भी भुगतना पड़ रहा है। जानकारी के मुताबिक सरकारी निर्माण कार्य के मामले में विभाग को संबंधित ठेकेदार को विभाग से निर्माण कार्य के लिए अंतिम भुगतान के दौरान मुरूम के अनुमानित खपत के आधार पर रायल्टी की राशि काट कर विभाग के खाते में जमा कर दी जाती है। चूंकि ठेकेदार निर्माण कार्य में मुरूम का उपयोग अवैध रुप से करता है, इसलिए रायल्टी के साथ ठेकेदार से जुर्माना भी वसूल किया जाता है। विभागीय अधिकारियों ने बताया कि ठेकेदारों से 80 रुपए प्रति स्क्वायर फीट के हिसाब से रायल्टी जमा कराया जा रहा है। जबकि रायल्टी की वास्तविक दर 20 रुपए प्रति स्क्वायर फीट है।

वहीं निजी निर्माण कार्य में प्रशासन को इस प्रकार की सुविधा नहीं मिल पाती और रायल्टी का सीधा नुकसान विभाग को उठाना पड़ रहा है।

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