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सशक्त बन रही हैं बेटियां:स्वामी आत्मानंद स्कूल के छात्राओं ने थाने पहुंचकर समझी कानून और सुरक्षा की ताकत

जब बेटियां थाने पहुंचीं तो डर नहीं, जागरूकता और आत्मविश्वास की नई शुरुआत दिखी

तिल्दा नेवरा। समाज में लंबे समय तक “थाना” एक ऐसा शब्द रहा है, जिससे आम लोग—खासतौर पर महिलाएं और बच्चियां—डर और संकोच महसूस करती थीं। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। आज की बेटियां न सिर्फ अपने अधिकारों को समझना चाहती हैं, बल्कि उन्हें जीना भी सीख रही हैं।इसी बदलाव की एक सशक्त तस्वीर तिल्दा नेवरा में देखने को मिली, जहां स्वामी आत्मानंद स्कूल की छात्राएं पुलिस थाना पहुंचीं—डर के साथ नहीं, बल्कि जिज्ञासा, आत्मविश्वास और सीखने की चाह के साथ।

करीब 55 छात्राओं का यह भ्रमण महज एक औपचारिक दौरा नहीं था, बल्कि एक ऐसे अनुभव की शुरुआत था, जिसने उनके मन से “पुलिस” को लेकर बनी झिझक को तोड़ा और विश्वास की नई नींव रखी। थाने के भीतर जब छात्राएं आगंतुक कक्ष से लेकर मालखाना, बंदी गृह और कंप्यूटर कक्ष तक पहुंचीं, तो उनके लिए यह एक नई दुनिया थी—एक ऐसी दुनिया, जहां कानून केवल किताबों में नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और कर्तव्य के रूप में जिया जाता है।

थाना प्रभारी रमाकांत तिवारी ने जब उन्हें पुलिस की भूमिका, कर्तव्यों और चुनौतियों के बारे में बताया, तो यह संवाद केवल जानकारी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रेरणा में बदल गया।
उन्होंने छात्राओं को यह समझाया कि कानून केवल सुरक्षा का साधन नहीं, बल्कि सशक्तिकरण का माध्यम भी है।इस दौरान “गुड टच और बैड टच” जैसे संवेदनशील विषयों पर खुलकर बातचीत हुई—एक ऐसा कदम, जो अक्सर समाज में नजरअंदाज कर दिया जाता है, लेकिन बेटियों की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है।

छात्राओं को यह भी बताया गया कि अगर कभी कोई उन्हें मानसिक या शारीरिक रूप से परेशान करता है, तो वे चुप न रहें, बल्कि निडर होकर अपनी बात सामने रखें।यह संदेश केवल एक सलाह नहीं, बल्कि उनके आत्मविश्वास को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास था।कार्यक्रम में सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों, महिला अधिकारों, ट्रैफिक नियमों और निर्भया पेट्रोलिंग जैसी व्यवस्थाओं की जानकारी भी दी गई—ताकि बेटियां सिर्फ जागरूक ही नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक भी बन सकें।

इस पूरे आयोजन में सबसे खास बात यह रही कि छात्राओं की आंखों में डर नहीं, बल्कि उत्साह और आत्मविश्वास झलक रहा था।यह वही बदलाव है, जिसकी आज समाज को सबसे ज्यादा जरूरत है—जहां बेटियां खुद को सुरक्षित महसूस करें, अपने अधिकारों को जानें और हर परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहें।

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