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तालाब बना ‘चोर बाजार’ का ठिकाना! तिल्दा में चोरी के सामान की कथित मंडी, कबाड़ की आड़ में खुलेआम कट रहीं बाइकें,और साईंकल  प्रशासन मौन क्यों?

तालाब पर कब्जा, चारों तरफ कबाड़ का कारोबार, 50 से ज्यादा संदिग्ध बाइकें और सरकारी योजनाओं के करोड़ों खर्च होने के बाद भी बदहाली! आखिर किसके संरक्षण में फल-फूल रहा है यह पूरा खेल?

तिल्दा-नेवरा -बड़े-बड़े शहरों में चोर बाजार के नाम से कुख्यात इलाके किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। राजधानी रायपुर का भी एक इलाका चोरी के सामान की खरीद-बिक्री को लेकर लंबे समय से चर्चाओं में रहा है। कहा जाता है कि वहां चोरी का सामान पहुंचते ही उसके पुर्जे अलग-अलग कर दिए जाते हैं, ताकि पहचान करना मुश्किल हो जाए। लेकिन अब ऐसा ही नजारा तिल्दा-नेवरा में भी दिखाई देने लगा है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां कथित चोर बाजार किसी सुनसान जगह पर नहीं, बल्कि शहर के एक ऐतिहासिक तालाब की जमीन पर आबाद हो गई है।

शहर के इस तालाब की कहानी कभी जीवन, निस्तार और जल संरक्षण से जुड़ी हुआ करती थी, लेकिन आज इसकी पहचान कथित तौर पर कबाड़, अवैध कब्जे और चोरी के संदिग्ध सामानों के कारोबार से बनती जा रही है। हालात ऐसे हैं कि जिस तालाब से कभी आसपास के कई मोहल्लों के लोग अपनी जरूरतें पूरी करते थे, आज वहां आम नागरिक जाने से भी कतराते हैं।

श्मशान घाट तालाब से कबाड़ तरिया तक का सफर

स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस तालाब को पहले श्मशान घाट तालाब के नाम से जाना जाता था। स्टेशन क्षेत्र से लेकर सिंधी कैंप, केवटपारा और सतनामी मोहल्ले तक के लोग इसी तालाब से निस्तार करते थे। यह केवल पानी का स्रोत नहीं था, बल्कि शहर के भूजल स्तर को बनाए रखने में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। कभी इस क्षेत्र में पानी की ऐसी किल्लत नहीं होती थी और तालाब भी सालभर पानी से भरा रहता था।

लेकिन समय के साथ तालाब के आसपास अतिक्रमण बढ़ता गया। पहले कुछ परिवारों ने यहां डेरा जमाया, फिर धीरे-धीरे अस्थायी ठिकाने स्थायी बस्तियों में बदलते चले गए। स्थानीय बोलचाल में इसका नाम बदलता गया और आज कोई इसे दलाल तरिया, कोई कबाड़ तरिया तो कोई चोर तालाब कहकर पुकारता है। सवाल यह है कि एक ऐतिहासिक जलस्रोत की यह दुर्दशा आखिर किसकी अनदेखी का नतीजा है?

15-20 घरों से 100 से अधिक परिवार, कैसे बढ़ता गया कब्जा?
स्थानीय लोगों का दावा है कि कभी यहां लगभग 15 से 20 परिवार ही रहते थे, लेकिन धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ती गई और अब 100 से अधिक देवार परिवारों के निवास करने की बात कही जा रही है। इनमें कई परिवार दूसरे राज्यों से आकर बसे हैंजिसकी जाँच जरुरी है । सवाल किसी जाति या समुदाय का नहीं, बल्कि सार्वजनिक तालाब की जमीन पर हुए कथित अवैध कब्जे और वहां चल रही गतिविधियों का है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब अतिक्रमण धीरे-धीरे बढ़ रहा था, तब नगर पालिका के जिम्मेदार अधिकारी क्या कर रहे थे? क्या किसी ने जमीन के रिकॉर्ड की जांच नहीं की? क्या कब्जे की जानकारी प्रशासन को नहीं थी? और यदि जानकारी थी तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई?

कबाड़ की आड़ में चोरी के सामान का खेल?
इस इलाके की सबसे गंभीर और चौंकाने वाली तस्वीर यहां चल रहे कबाड़ के कारोबार से सामने आती है। समाचार पत्र के संवाददाता ने जब मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा लिया तो कबाड़ के बीच लगभग 50 दोपहिया वाहन पड़े दिखाई दिए। कई साइकिलों के पहिए अलग थे, कहीं हैंडल निकाले गए थे तो कहीं वाहनों के दूसरे पुर्जे अलग-अलग पड़े थे।
कुछ स्थानों पर लोहे और अन्य सामान को खुलेआम जलाया जा रहा था। वहीं कई कीमती सामानों को गैस कटर जैसी मशीनों से काटकर अलग-अलग किए जाने की गतिविधियां भी दिखाई दीं।
इन तस्वीरों ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर इतनी बड़ी संख्या में दोपहिया वाहन कबाड़ के बीच कैसे पहुंच रहे हैं? क्या इनके पास खरीद-बिक्री के वैध दस्तावेज हैं? क्या वाहनों के इंजन और चेसिस नंबर की जांच होती है? यदि सब कुछ वैध है तो फिर वाहनों के पुर्जे अलग-अलग करने की जरूरत क्यों पड़ रही है?
स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि आसपास होने वाली छोटी-मोटी चोरियों का सामान यहां लाकर खपाया जाता है। कुछ लोगों का दावा है कि कम उम्र के बच्चे भी चोरी के सामान को यहां पहुंचाने और ठिकाने लगाने में इस्तेमाल किए जाते हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुलिस जांच जरूरी है।
क्या जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों को सब कुछ पता नहीं?

इस पूरे मामले में सबसे गंभीर आरोप यह है कि तालाब की जमीन पर बस्ती बसने और कबाड़ कारोबार के विस्तार के पीछे कुछ स्थानीय जनप्रतिनिधियों तथा नगर पालिका से जुड़े लोगों का संरक्षण होने की चर्चा है। यहां तक कि कुछ लोगों द्वारा कथित रूप से नियमित रकम वसूली किए जाने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं।

पुलिस और कुछ जिम्मेदार लोगों तक कथित बंदी पहुंचने की चर्चाएं भी स्थानीय स्तर पर हैं। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित लोगों का पक्ष सामने आना बाकी है।
यदि इन आरोपों में जरा भी सच्चाई है तो यह केवल अतिक्रमण का मामला नहीं, बल्कि सरकारी जमीन, सार्वजनिक संपत्ति और कानून-व्यवस्था से जुड़ा गंभीर विषय है। ऐसे में प्रशासन को केवल शिकायत का इंतजार करने के बजाय स्वतः संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच करानी चाहिए।

करोड़ों खर्च, फिर भी तालाब की बदहाली क्यों?

हैरानी की बात यह है कि इसी तालाब के सौंदर्यीकरण और विकास के लिए नगर पालिका द्वारा अलग-अलग योजनाओं के तहत करोड़ों रुपये खर्च किए जाने की बात सामने आती रही है। लेकिन आज इसकी हालत देखकर विकास योजनाओं की हकीकत पर सवाल खड़े होते हैं।
तालाब गंदगी से पटा पड़ा है। आसपास अतिक्रमण और कबाड़ का जमावड़ा है। आम नागरिक वहां जाने से कतराते हैं। जिस जलस्रोत को शहर की पहचान और भविष्य की जल सुरक्षा का आधार होना चाहिए था, वह आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है।
आखिर सौंदर्यीकरण के नाम पर खर्च हुई राशि कहां गई? क्या कभी काम का भौतिक सत्यापन हुआ? क्या अधिकारियों ने मौके पर जाकर स्थिति देखी? और यदि विकास कार्य अतिक्रमण के कारण रुक गए तो अतिक्रमण हटाने की जिम्मेदारी किसकी थी?
नगर पालिका का जवाब- विरोध के कारण नहीं हो पा रहा विकास
इस संबंध में जब नगर पालिका के अधिकारी से चर्चा की गई तो उन्होंने स्वीकार किया कि तालाब की जमीन पर अवैध कब्जा हुआ है। उन्होंने बताया कि तालाब के विकास और सौंदर्यीकरण के लिए कई बार योजनाएं बनाई गईं, लेकिन विरोध के कारण काम आगे नहीं बढ़ पा रहा है।
अब सवाल यह है कि यदि नगर पालिका को अवैध कब्जे की जानकारी है और विकास कार्य भी इसी कारण रुके हुए हैं तो अतिक्रमण हटाने के लिए ठोस कदम क्यों नहीं उठाए गए? क्या सार्वजनिक तालाब को अतिक्रमणकारियों के हवाले छोड़ देना ही प्रशासन का समाधान है?

पुलिस का जवाब- शिकायत मिलने पर करते हैं कार्रवाई
पुलिस से चर्चा करने पर बताया गया कि शिकायत मिलने पर कार्रवाई की जाती है। इस मामले में कई लोगों पर कार्रवाई की गई है और कुछ आरोपियों को जेल भी भेजा गया है।
लेकिन मौके पर दिखाई देने वाली तस्वीरें एक अलग ही कहानी बयां करती हैं। यदि लगातार कार्रवाई हो रही है तो फिर इतनी बड़ी संख्या में वाहन और उनके अलग-अलग पुर्जे कबाड़ के बीच कैसे जमा हैं? क्या इन वाहनों की पहचान और दस्तावेजों की जांच की गई है? क्या कबाड़ कारोबारियों के रिकॉर्ड खंगाले गए हैं? क्या यह पता लगाया गया है कि इन वाहनों का मालिक कौन है और वे यहां तक कैसे पहुंचे?
अब जवाब चाहिए, सिर्फ बयान नहीं!
तिल्दा का यह तालाब केवल जमीन का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि शहर की जल विरासत है। इसे अतिक्रमण, गंदगी और संदिग्ध कारोबार के हवाले छोड़ना आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय है।
प्रशासन को चाहिए कि तालाब की पूरी जमीन का सीमांकन कराया जाए, अवैध कब्जों की जांच हो, कबाड़ कारोबारियों के लाइसेंस और खरीद-बिक्री के रिकॉर्ड खंगाले जाएं, मौके पर मिले वाहनों के इंजन और चेसिस नंबर की जांच हो तथा चोरी के सामान की खरीद-बिक्री में संलिप्त लोगों पर सख्त कार्रवाई की जाए।
साथ ही तालाब के सौंदर्यीकरण पर खर्च की गई राशि का भी ऑडिट कराया जाना चाहिए।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि तिल्दा के इस ऐतिहासिक तालाब को आखिर किसने चोर बाजार में तब्दील होने दिया? क्या नगर पालिका को सब कुछ पता है? क्या पुलिस को इन गतिविधियों की जानकारी नहीं है? और यदि सबको जानकारी है तो फिर कार्रवाई का इंतजार आखिर कब तक?

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