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सौरभ चंद्राकर तो पकड़ में आ गया, अब उन खाकीधारियों और सफेदपोशों की बारी कब

महादेव सट्टा ऐप का किंगपिन भारत लौटा, लेकिन सवाल बरकरार—विदेश में बैठा सरगना और छत्तीसगढ़ में चलता रहा सट्टे का कारोबार आखिर किसकी मेहरबानी से?

समीक्षा एवं बेबाक टिप्पणी : इंदर कोटवानी

महादेव सट्टा ऐप के कथित साम्राज्य का प्रमुख संचालक सौरभ चंद्राकर आखिरकार ओमान से भारत लाया जा चुका है। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई करते हुए उसे भारत वापस लाने में सफलता हासिल की है। करीब 6 हजार करोड़ रुपये के कथित अवैध सट्टा और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में यह निश्चित रूप से एक बड़ी कार्रवाई है। अब उससे पूछताछ होगी, पुराने लेन-देन की कड़ियां खंगाली जाएंगी और जांच एजेंसियों को उम्मीद है कि इस नेटवर्क से जुड़े कई और चेहरे बेनकाब हो सकते हैं।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल सौरभ चंद्राकर की गिरफ्तारी से भी बड़ा है।

क्या महादेव सट्टा ऐप का पूरा साम्राज्य केवल सौरभ चंद्राकर के भरोसे चल रहा था? क्या उसके विदेश चले जाने के बाद छत्तीसगढ़ में सट्टे का कारोबार बंद हो गया था? अगर नहीं, तो फिर यहां इस अवैध कारोबार को कौन संचालित कर रहा था?

यह सवाल इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इस मामले की जांच में पुलिस, प्रशासन और प्रभावशाली लोगों तक कथित संरक्षण राशि पहुंचने के आरोप सामने आ चुके हैं।

जूस बेचने वाला अचानक हजारों करोड़ के साम्राज्य तक कैसे पहुंचा?

कभी जूस का कारोबार करने वाला सौरभ चंद्राकर आखिर इतनी बड़ी अवैध ऑनलाइन सट्टेबाजी व्यवस्था का प्रमुख चेहरा कैसे बन गया? यह केवल एक व्यक्ति की आर्थिक तरक्की की कहानी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है जिसमें अवैध कारोबार को पनपने का मौका मिलता है।

आरोप है कि महादेव ऐप के जरिए देश-विदेश में सट्टेबाजी का नेटवर्क फैलाया गया। अलग-अलग पैनल और ब्रांच ऑपरेटरों के माध्यम से कारोबार संचालित हुआ। हजारों करोड़ रुपये के अवैध लेन-देन और हवाला नेटवर्क की जांच हुई। ईडी और दूसरी जांच एजेंसियों ने इस मामले में कई लोगों की भूमिका की पड़ताल की।

लेकिन सवाल यह है कि जब यह कारोबार इतना बड़ा हो रहा था, तब स्थानीय पुलिस और संबंधित विभागों को इसकी भनक क्यों नहीं लगी? और यदि जानकारी थी, तो समय रहते इसे पूरी तरह बंद क्यों नहीं कराया जा सका?

विदेश में सरगना, देश में चलता रहा कारोबार—आखिर किसके भरोसे?

मान लीजिए सौरभ चंद्राकर विदेश में बैठकर ऐप का संचालन कर रहा था। लेकिन उसके पैनल, बैंक खाते, स्थानीय एजेंट, सट्टेबाज और लेन-देन की व्यवस्था तो भारत में भी मौजूद थी।

तो क्या सौरभ के विदेश चले जाने के बाद यहां सट्टे का कारोबार बंद हो गया था?

अगर नहीं हुआ, तो फिर इस कारोबार का स्थानीय संचालन कौन कर रहा था? किन लोगों के माध्यम से करोड़ों रुपये का लेन-देन हो रहा था? किनके संरक्षण में पैनल चल रहे थे?

पुलिस के पास मुखबिर तंत्र है, साइबर सेल है, खुफिया तंत्र है। फिर इतने बड़े नेटवर्क की जड़ें स्थानीय स्तर पर कैसे फैलती रहीं?

क्या बिना किसी स्थानीय व्यवस्था और संरक्षण के इतने बड़े पैमाने पर अवैध सट्टेबाजी का कारोबार चल सकता है?

यह सवाल किसी एक पुलिसकर्मी पर आरोप लगाने के लिए नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की जवाबदेही तय करने के लिए है।

35 लाख रुपये महीने का आरोप! किन अधिकारियों के नाम सामने आए?

इस मामले में सबसे गंभीर पहलू पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को कथित तौर पर संरक्षण राशि दिए जाने के आरोप हैं।

ईडी की जांच में सामने आए तत्कालीन एएसआई चंद्रभूषण वर्मा के बयान के आधार पर कई मीडिया रिपोर्टों में पुलिस अधिकारियों को हर महीने लाखों रुपये दिए जाने के आरोप प्रकाशित हुए थे।

इन रिपोर्टों में प्रमुख रूप से निम्न नामों का उल्लेख हुआ:

  • अभिषेक माहेश्वरी: तत्कालीन अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के संबंध में 35 लाख रुपये प्रतिमाह मिलने का आरोप प्रकाशित हुआ। संबंधित अधिकारी ने इन आरोपों को निराधार बताया था।
  • अजय यादव: तत्कालीन आईजी स्तर के अधिकारी के संबंध में 20 लाख रुपये प्रतिमाह मिलने का आरोप रिपोर्टों में सामने आया।
  • प्रशांत अग्रवाल: तत्कालीन एसएसपी रायपुर के संबंध में 20 लाख रुपये प्रतिमाह मिलने का आरोप प्रकाशित हुआ।
  • संजय ध्रुव: तत्कालीन अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक दुर्ग के संबंध में 25 लाख रुपये प्रतिमाह मिलने का आरोप सामने आया।

यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ये रकम चंद्रभूषण वर्मा के कथित बयानों और मीडिया में प्रकाशित आरोपों पर आधारित हैं। इन अधिकारियों के विरुद्ध इन आरोपों को अदालत में सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता। किसी अधिकारी का नाम सामने आना और उसका दोष सिद्ध होना दो अलग बातें हैं।

इस मामले में चंद्रभूषण वर्मा, भीम सिंह यादव और अर्जुन सिंह यादव जैसे पुलिसकर्मियों की भूमिका भी जांच और अभियोजन के दायरे में आई। चंद्रभूषण वर्मा निलंबित एएसआई था और भीम सिंह यादव तथा अर्जुन सिंह यादव बर्खास्त आरक्षक बताए गए हैं।

अब सवाल यह है कि जिन आरोपों में लाखों रुपये प्रतिमाह की बात कही गई, उन आरोपों की जांच कहां तक पहुंची? किसके खिलाफ आरोपपत्र दाखिल हुआ? किसे आरोपी बनाया गया? और किसे क्लीन चिट मिली?

क्या जांच एजेंसियां इन सवालों का जवाब जनता के सामने रखेंगी?

अगर हर महीने 35 लाख रुपये दिए गए तो हिसाब भी होना चाहिए!

जरा गणित समझिए।

यदि किसी अधिकारी को 35 लाख रुपये प्रतिमाह दिए जाने का आरोप है, तो एक साल में यह रकम 4 करोड़ 20 लाख रुपये होती है।

और यदि यह कथित भुगतान लंबे समय तक चलता रहा, तो रकम करोड़ों में पहुंच सकती है।

लेकिन यह पैसा आया कहां से? किसके माध्यम से पहुंचा? किस बैंक खाते, किस संपत्ति या किस दूसरे रास्ते से इसका लेन-देन हुआ?

जांच एजेंसियों को केवल सट्टेबाजों की संपत्ति नहीं, बल्कि कथित संरक्षण राशि के पूरे नेटवर्क की जांच करनी चाहिए।

सट्टे से कमाई करने वाला आरोपी जेल में हो और कथित संरक्षण लेने वालों की जवाबदेही ही तय न हो, तो आम जनता के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है।

क्या पुलिस की जानकारी के बिना चल सकता है सट्टा, जुआ और नशे का कारोबार?

यहां एक बात समझने की जरूरत है। किसी भी अवैध कारोबार को रोकने की प्राथमिक जिम्मेदारी कानून लागू करने वाली एजेंसियों की होती है।

किस इलाके में जुआ चल रहा है, कहां अवैध सट्टा संचालित हो रहा है, कहां गांजा और अफीम की तस्करी हो रही है, कहां अवैध शराब बिक रही है—इन गतिविधियों पर पुलिस की निगरानी और कार्रवाई जरूरी है।

ऐसे में जब छोटे-मोटे सट्टेबाजों पर कार्रवाई होती है, उनके पास से रकम बरामद होती है, लेकिन बड़े नेटवर्क तक पहुंचने में व्यवस्था नाकाम रहती है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

क्या कार्रवाई केवल छोटे मोहरों तक सीमित रहनी चाहिए या उन लोगों तक भी पहुंचनी चाहिए जो इस पूरे कारोबार को चलाते हैं?

यदि किसी नेता या प्रभावशाली व्यक्ति का किसी सट्टेबाज के साथ उठना-बैठना है, तो क्या इससे उसे कानून से छूट मिल जाती है?

कानून की वर्दी का सम्मान तभी होगा, जब उसका इस्तेमाल अपराध रोकने के लिए हो, अपराधियों को बचाने के लिए नहीं।

बाबू खेमानी से लेकर सौरभ चंद्राकर तक—बड़े नामों का हिसाब कौन देगा?

कुछ समय पहले बाबू खेमानी की गिरफ्तारी को लेकर भी काफी चर्चा हुई थी। उसकी कथित संपत्ति को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जा रहे थे। लेकिन संपत्ति जब्ती और जांच में सामने आने वाले वास्तविक आंकड़ों का अंतर भी जनता के सामने स्पष्ट होना चाहिए।

किसी व्यक्ति के बारे में करोड़ों की संपत्ति होने की चर्चा और जांच में प्रमाणित संपत्ति का आंकड़ा अलग-अलग हो सकता है। इसलिए हर मामले में दस्तावेज और आधिकारिक आंकड़े सामने आने चाहिए।

यही नियम सौरभ चंद्राकर के मामले में भी लागू होना चाहिए।

केवल गिरफ्तारी से काम पूरा नहीं होगा। यह पता लगाना होगा कि अवैध कमाई किस-किस तक पहुंची, किन लोगों ने संपत्ति बनाई और किन लोगों ने अपने पद का दुरुपयोग किया।

राजनीति के संरक्षण का सवाल भी कम गंभीर नहीं

महादेव ऐप मामले में राजनीतिक लोगों के नाम भी जांच और एफआईआर में सामने आए हैं। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का नाम भी 2024 में दर्ज ईओडब्ल्यू की एफआईआर में शामिल किया गया था। उन्होंने उस समय इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताया था।

इसलिए किसी राजनीतिक व्यक्ति के नाम का उल्लेख मात्र दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है। लेकिन यदि किसी भी दल के नेता, मंत्री, विधायक या जनप्रतिनिधि की भूमिका जांच में सामने आती है, तो निष्पक्ष कार्रवाई होनी चाहिए।

यह सवाल किसी एक पार्टी का नहीं है।

यदि सत्ता पक्ष का कोई नेता किसी सट्टेबाज के साथ खड़ा दिखाई देता है, तो उससे सवाल होना चाहिए। यदि विपक्ष का कोई नेता कथित संरक्षण देता है, तो उससे भी सवाल होना चाहिए।

सट्टे का पैसा किसी पार्टी का नहीं होता, लेकिन उससे बर्बाद होने वाले परिवार हर पार्टी और हर वर्ग में होते हैं।

मुख्यमंत्री से सीधा सवाल—सिर्फ सौरभ नहीं, पूरे नेटवर्क पर कार्रवाई कीजिए

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने सौरभ चंद्राकर को भारत लाने में सफलता के लिए सीबीआई को बधाई दी है और सामने आने वाले नामों पर कार्रवाई की बात कही है।

मुख्यमंत्री जी, प्रदेश की जनता आपसे कुछ सीधे सवाल पूछना चाहती है।

  1. क्या महादेव ऐप मामले में कथित रूप से संरक्षण राशि लेने वाले सभी पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की संपत्ति की जांच होगी?
  2. क्या 35 लाख रुपये प्रतिमाह जैसे आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाएगी?
  3. क्या यह पता लगाया जाएगा कि सौरभ के विदेश जाने के बाद छत्तीसगढ़ में उसके नेटवर्क का संचालन कौन कर रहा था?
  4. क्या राजनीतिक संरक्षण देने वाले किसी भी व्यक्ति को जांच के दायरे से बाहर नहीं रखा जाएगा?
  5. क्या छोटे सट्टेबाजों के साथ-साथ बड़े पैनल संचालकों और उनके आर्थिक संरक्षकों पर भी कार्रवाई होगी?
  6. क्या जांच की प्रगति और दोषी पाए गए अधिकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई जनता के सामने रखी जाएगी?

मुख्यमंत्री जी, सौरभ चंद्राकर को भारत लाना बड़ी सफलता है, लेकिन असली सफलता उस दिन होगी जब उसके पूरे नेटवर्क को ध्वस्त किया जाएगा।

आखिरी सवाल जनता के नाम नहीं, व्यवस्था के नाम!

आज कितने परिवार ऑनलाइन सट्टे की लत में बर्बाद हो रहे हैं। कोई अपनी जमा पूंजी गंवा रहा है, कोई कर्ज में डूब रहा है, तो कोई परिवार की खुशियां दांव पर लगा रहा है।

ऐसे में सिर्फ छोटे सट्टेबाजों को पकड़कर फोटो खिंचवाने से समस्या समाप्त नहीं होगी।

सौरभ चंद्राकर एक व्यक्ति है, लेकिन महादेव सट्टा ऐप का नेटवर्क एक पूरी व्यवस्था के रूप में जांच का विषय है।

यदि इस व्यवस्था में पुलिसकर्मी, अधिकारी, कारोबारी या राजनीतिक रसूखदार शामिल पाए जाते हैं, तो उनके खिलाफ भी कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए।

क्योंकि सवाल यह नहीं है कि सौरभ चंद्राकर कितना बड़ा सट्टेबाज था। सवाल यह है कि उसे इतना बड़ा बनने का मौका किसने दिया?

एक सौरभ चंद्राकर तो ओमान से भारत आ गया, लेकिन क्या जांच एजेंसियां उन सभी चेहरों तक पहुंचेंगी जो कथित तौर पर उसके साम्राज्य को संरक्षण दे रहे थे?

कहीं ऐसा न हो कि सरगना तो सलाखों के पीछे पहुंच जाए, लेकिन उसके साम्राज्य को चलाने वाले असली मददगार फिर किसी नए नाम से अपना कारोबार शुरू कर दें।

एक सौरभ पकड़ा गया, कई सौरभ अब भी बेखौफ?
सौरभ चंद्राकर की गिरफ्तारी के बाद क्या महादेव सट्टे का पूरा कारोबार समाप्त हो जाएगा? शायद नहीं! क्योंकि छोटे शहरों से लेकर राजधानी रायपुर और न्यायधानी बिलासपुर तक ऐसे कई चेहरे चर्चा में हैं, जिनके अवैध कारोबार का नेटवर्क देशभर में फैले होने के आरोप लगते रहे हैं।
रायपुर से लगे एक शहर में तो एक कथित सट्टा कारोबारी के साथ मंत्री के सार्वजनिक रूप से उठने-बैठने और उसे राजनीतिक संरक्षण मिलने को लेकर भी सवाल उठाए जाते रहे हैं। चर्चा तो यहां तक है कि उसे पार्टी की सदस्यता दिलाने के बाद पार्षद का टिकट भी दिया गया और वह चुनाव जीतकर जनप्रतिनिधि बन गया। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित पक्षों का जवाब सामने आना जरूरी है।
कहा जाता है कि कभी यही व्यक्ति गैस सिलेंडर के कथित अवैध कारोबार और नकली गुटखा बेचने जैसे छोटे-मोटे धंधों से जुड़ा हुआ था, लेकिन आज उसकी संपत्ति सैकड़ों करोड़ रुपये तक पहुंचने की चर्चाएं हैं। यदि ये दावे सही हैं तो इसकी निष्पक्ष जांच क्यों नहीं होनी चाहिए? उसकी कमाई के स्रोत क्या हैं? उसके कारोबार का नेटवर्क कहां तक फैला है? और प्रभावशाली लोगों से उसके संबंधों की वास्तविकता क्या है?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी सट्टा कारोबारी के साथ मंत्री सार्वजनिक रूप से दिखाई देता है, तो स्थानीय पुलिस और प्रशासन उससे पूछताछ करने का साहस कैसे जुटाएंगे? क्या राजनीतिक नजदीकियां कानून से ऊपर हो सकती हैं?
कहीं ऐसा न हो कि आज की तारीख में जिस पर कार्रवाई नहीं हो रही, कल तक वह भी दूसरा सौरभ चंद्राकर बन जाए और फिर उसे पकड़ने के लिए विदेशों में तलाश करनी पड़े।
एक सौरभ चंद्राकर को पकड़कर पीठ थपथपाने से काम नहीं चलेगा। सरकार और जांच एजेंसियों को उन सभी कथित सट्टा कारोबारियों की भी जांच करनी होगी, जिनके नेटवर्क के पीछे राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण होने के आरोप हैं। वरना आज एक सौरभ पकड़ा है, कल दस नए सौरभ तैयार मिलें

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