रायगढ़-छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के करमागढ़ गांव में सोमवार (6 अक्टूबर) को शरद पूर्णिमा के अवसर पर मां मानकेश्वरी देवी मंदिर में पारंपरिक बल पूजा की गई । इस पूजा में करीब 40 बकरों की बलि दी गई और परंपरा के अनुसार गांव के मुख्य बैगा ने उनका रक्त ग्रहण किया । ग्रामीणों के अनुसार, बल पूजा के दौरान देवी मां बैगा के शरीर में अवतरित होती हैं, और उन्हीं के आदेश पर बलि की रस्म पूरी की जाती है। चौंकाने वाली बात यह है कि इतना रक्त पीने के बाद भी बैगा को कोई साईंड इफेक्ट नही हुआ ..बलि की ये परंपरा करीब 500 साल से चली आ रही है। बलि देने और खून पीने का वीडियो सामने आया है।

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में शरद पूर्णिमा के दिन मानकेश्वरी देवी मंदिर में बैगा ने 40 बकरों की बलि देकर उनका खून पीया। बलि चढाए गए बकरे ग्रामीणों के द्वारा लाए गए थे,बकरों की पहले देवी के सामने पूजा-अर्चना की फिर उसकी बलि दी । इस दौरान सभी बकरो का खून बैगा पी गया ,मानकेश्वरी देवी के भक्तों के मुताबिक इतना खून पीने के बाद भी बैगा के शरीर में कोई साइड इफेक्ट नजर नहीं आता। उनकी माने तो इस दिन बैगा के शरीर में देवी आतीं हैं और वो बलि दिए गए बकरों का खून पीती हैं।
बलि पूजा के बाद बकरे का श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरण किया गया ।श्रद्धालुओं के मुताबिक जिनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं, वे यहां बकरा और नारियल लाकर चढ़ाते हैं। ग्रामीणों की माने तो पहले 150 से 200 बकरों की बलि दी जाती थी, लेकिन कोरोना काल के बाद से इनकी संख्या करीब 100 तक हो गई है। अब और कम होकर 40 पहुंच गई है।

मानकेश्वरी देवी पूजन समिति के पूर्व अध्यक्ष युधिष्ठिर यादव ने बताया कि बलि पूजा से एक रात पहले यानी 5 अक्टूबर को निशा पूजा पूरे विधि-विधान के साथ की गई। जब यह पूजा होती है, तो राज परिवार से एक ढीली अंगूठी बैगा के अंगूठे में पहनाई जाती है। हालांकि ये अंगूठी बैगा के नाप की नहीं होती, लेकिन बलि पूजा के दौरान बैगा के अंगूठे में वो अंगूठी पूरी तरह से कस जाती है। इससे एहसास होता है कि अब देवी का वास बैगा के शरीर में हो गया है। उसके बाद श्रद्धालु बैगा के पैर धोते हैं और सिर पर दूध डालकर पूजा करते हैं।
मानकेश्वरी देवी पूजन समिति के पूर्व अध्यक्ष युधिष्ठिर यादव ने बताया कि मां मानकेश्वरी देवी की काफी मान्यता है। बैगा के ऊपर मां मानकेश्वरी देवी सवार होती हैं। यहां श्रद्धालु रायगढ़ के अलावा दूसरे जिले और ओडिशा से भी आते हैं। अपनी मनोकामना मांगते हैं, जब मन्नत पूरी होती जाती है तो बकरा चढ़ाते हैं।
युधिष्ठिर यादव बताते हैं कि, पूर्वजों से सुना है कि राजा के हाथ में अंग्रेज सेना ने बेड़ी (जंजीर) लगा दिया था। बंदी बनाकर जंगल के रास्ते से ले जा रहे थे, तभी राजा ने देवी मां को याद किया। तब मधुमक्खियों ने अंग्रेजों को दौड़ाकर भगा दिया था। इसके बाद मां मानकेश्वरी देवी ने उन्हें दर्शन दिया। उन्हें बेड़ियों से मुक्त कर दिया। तब से यहां पूजापाठ हो रही है। उन्होंने बताया कि, मंदिर में मान्यता है कि, जिनका परिवार नहीं बढ़ रहा या कोई बीमारी है, तो यहां आकर मन्नत मांगने पर मनोकामना पूरी होती हैं।
उधर घरघोड़ा के लोगो का मानना है कि गोड़ राजा रायगढ़ जिला के राजा चक्रधर सिंह के परिवार ने मंदिर की स्थापना की गई थी, तब से परंपरा चली आ रही है। बलि पूजा की मान्यताएं हैं। श्रद्धालु अपने मन से बलि देते हैं, जिससे श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। बलि दिए जाने के दौरान आसपास के गांव से हजारों की संख्या में लोग यहां आते हैं। बाली दिए बकरे का प्रसाद लेकर जाते हैं।रायगढ़ से वीसीएन टाइम्स की रिपोर्

