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लाश पर सीमा विवाद! 7 घंटे तक तड़पती रही इंसानियत, पुलिस तय करती रही इलाका”

इंदर कोटवानी –

तिल्दा नेवरा -तिल्दा रेलवे स्टेशन से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने पुलिस व्यवस्था और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। एक वृद्ध महिला की मौत के बाद उसका शव घंटों तक खुले में पड़ा रहा, लेकिन कानून की रक्षा का दावा करने वाली तीन-तीन एजेंसियां—आरपीएफ, जीआरपी और स्थानीय पुलिस—अपने-अपने अधिकार क्षेत्र का हवाला देकर जिम्मेदारी से बचती रहीं। सवाल यह है कि जब एक बेबस महिला की लाश सम्मान की प्रतीक्षा कर रही थी, तब सिस्टम आखिर किस नियम की किताब पलट रहा था?

तिल्दा रेलवे स्टेशन के टिकट घर के सामने निर्माणाधीन भवन में आज सुबह करीब 5:30 बजे एक वृद्ध महिला की मौत हो गई। घटना की सूचना तत्काल रेलवे स्टेशन स्थित आरपीएफ थाने को दी गई, लेकिन आरोप है कि कई घंटों तक कोई भी अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचा। जब स्थानीय लोगों ने दोबारा रेलवे प्रशासन और आरपीएफ को सूचना दी तो मामला अधिकार क्षेत्र का बताकर जिम्मेदारी टाल दी गई। आरपीएफ ने मेमो भेजकर तिल्दा नेवरा  पुलिस को सूचना दे दी, जबकि स्थानीय पुलिस ने इसे रेलवे क्षेत्र का मामला बताते हुए जीआरपी की ओर इशारा कर दिया।

नतीजा यह हुआ कि एक महिला का शव लगभग 7 घंटे तक मौके पर पड़ा रहा और पुलिस विभागों के बीच कागजी कार्रवाई घूमती रही। इस दौरान लोगों में भारी नाराजगी देखने को मिली। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार वृद्ध महिला कई दिनों से रात के समय इसी स्थान पर दिखाई देती थी, लेकिन उसकी पहचान अब तक नहीं हो सकी है।
करीब 6 घंटे बाद तिल्दा थाना प्रभारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे। पंचनामा कार्रवाई के बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया और मर्ग कायम कर जांच शुरू कर दी गई।

सवाल…
सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट कर चुका है कि किसी भी शिकायत या घटना को क्षेत्राधिकार के नाम पर लेने से इनकार नहीं किया जा सकता। जीरो एफआईआर की व्यवस्था इसी उद्देश्य से बनाई गई है कि पीड़ित या घटना कार्रवाई के अभाव में न फंसे। फिर एक मृत महिला के मामले में पुलिस विभागों के बीच यह सीमा विवाद क्यों चलता रहा?

एक ओर सरकार संवेदनशील प्रशासन और सुशासन के दावे करती है, दूसरी ओर एक लावारिस वृद्ध महिला की लाश घंटों तक सम्मान की प्रतीक्षा करती रहती है। सवाल सिर्फ एक शव का नहीं है, सवाल उस व्यवस्था का है जो इंसानियत से पहले अपनी सीमाएं तलाशती है। अगर मौत के बाद भी सम्मान पाने के लिए सात घंटे इंतजार करना पड़े, तो फिर व्यवस्था की संवेदनशीलता पर सवाल उठना लाजिमी है।

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