भिलाई -छत्तीसगढ़ के चर्चित भारतमाला मुआवजा घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई ने एक बार फिर सियासी और प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है। भिलाई में रिटायर्ड आईएएस और पीएससी भर्ती घोटाले के आरोपी जेके ध्रुव के ठिकानों पर ईडी ने तड़के दबिश दी है। करीब 6 गाड़ियों में पहुंचे अधिकारियों की टीम दस्तावेज, डिजिटल साक्ष्य और वित्तीय लेनदेन की कड़ियां खंगाल रही है। सवाल बड़ा है कि आखिर 43 करोड़ के इस कथित घोटाले की जड़ें कहां तक फैली हैं और इसमें कौन-कौन शामिल है? देखिए ये रिपोर्ट…
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जेके ध्रुव पहले से ही छत्तीसगढ़ पीएससी भर्ती घोटाले के मामले में आरोपी हैं और फिलहाल जेल में बंद हैं। अब भारतमाला परियोजना में हुए कथित मुआवजा घोटाले से जुड़े तार सामने आने के बाद ईडी की यह कार्रवाई बेहद अहम मानी जा रही है। हालांकि एजेंसी की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।
…दरअसल, रायपुर-विशाखापट्टनम आर्थिक कॉरिडोर के लिए जमीन अधिग्रहण के दौरान करोड़ों रुपए के मुआवजे में गड़बड़ी का आरोप है। जांच में सामने आया कि जमीनों को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर खसरों की संख्या बढ़ाई गई और रिकॉर्ड में नए नाम जोड़कर मुआवजा राशि कई गुना बढ़ा दी गई। जिस जमीन का वास्तविक मुआवजा करीब 29 करोड़ 50 लाख रुपए होना था, उसका भुगतान 70 करोड़ रुपए से अधिक दिखाया गया।
–इस पूरे मामले में हरमीत सिंह खनूजा को मुख्य आरोपी माना जा रहा है। ईडी को जांच के दौरान कारोबारी हरमीत सिंह चावला और उनके परिवार से जुड़े वित्तीय लेनदेन के सुराग भी मिले हैं। एजेंसी अब डिजिटल रिकॉर्ड, बैंकिंग ट्रांजैक्शन और दस्तावेजों के जरिए घोटाले की परतें खोलने में जुटी है।
इस मामले में पहले ही कई अधिकारियों पर कार्रवाई हो चुकी है। कोरबा के डिप्टी कलेक्टर शशिकांत कुर्रे को निलंबित किया जा चुका है, जबकि जगदलपुर निगम आयुक्त निर्भय साहू समेत कई अधिकारियों पर करोड़ों रुपए की अनियमितता के आरोप लगे हैं। सरकार की जांच रिपोर्ट में 43 करोड़ 18 लाख रुपए से अधिक की गड़बड़ी का उल्लेख किया गया है।
भारत-माला परियोजना देश की विकास यात्रा का बड़ा सपना है, लेकिन अगर विकास के नाम पर मुआवजे की रकम को लूट का जरिया बना दिया जाए तो यह सिर्फ सरकारी खजाने नहीं, जनता के भरोसे पर भी डाका है। अब निगाहें ईडी की जांच पर हैं कि आखिर इस कथित घोटाले का असली मास्टरमाइंड कौन है और क्या वाकई सफेदपोश चेहरों तक कानून का हाथ पहुंच पाएगा, या फिर फाइलों में दबकर रह जाएगी जवाबदेही?

