सुबह 4 बजे उठकर करेंगी असुर, दिनभर पूजा-अर्चना और श्रृंगार के बाद तिजीरी माता को झूला झुलाने की परंपरा
तिल्दा-नेवरा।सिंधी समाज की सुहागिन महिलाएं पति की दीर्घायु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना को लेकर सोमवार को तीजा पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाएंगी। पर्व को लेकर महिलाओं ने रविवार को ही तैयारियां पूरी कर लीं। तीजा के दिन महिलाएं अल सुबह करीब 4 बजे उठकर असुर करेंगी और इसके बाद निर्जला व्रत की शुरुआत करेंगी। उसके बाद महिलाएं हाथों में मेहंदी भी रचाएंगी। तीज, पर मेहंदी लगाना शुभ माना जाता है। हालांकि अधिकांश महिलाओं ने मेहंदी का रंग गहरा करने के लिए रात में ही मेहंदी लगा लिया था ।
सुबह स्नान आदि के बाद सुहागिने महिलाएं पूजा-अर्चना करेंगी और पूरे दिन निर्जला व्रत रखेंगी। इस दौरान सुहागिन महिलाएं नए वस्त्र धारण कर सोलह श्रृंगार करेंगी। दोपहर 12 बजे के बाद महिलाएं टोली बनाकर ट्रीजड़ी माता की पूजा-अर्चना करेंगी और परंपरा के अनुसार माता को झूले में झुलाएंगी।
मायके में तीज मनाने की रही है परंपरा
सिंधी समाज में तीजा पर्व से जुड़ी मायके की परंपरा भी खास रही है। विवाह के बाद बेटियां राखी के अवसर पर मायके आती है और तीजा सहित जन्माष्टमी तक मायके में ही रहती है । तीज के दिन परिवार की महिलाओं, रिश्तेदारों और सहेलियों के साथ मिलकर दिनभर पर्व मनाने की परंपरा रही है। पहले महिलाएं ताश की तीन पत्तियों का खेल खेलकर भी समय बिताती थीं। शाम को भगवान शिव पार्वती के समक्ष भजन-कीर्तन होता था और रात में महिलाएं एक स्थान पर एकत्र होकर ट्रीजीरी माता की कथा सुनती है ।कथा के बाद महिलाओं को चांद निकलने का इंतजार रहता है । चंद्रमा के दर्शन होते ही उन्हें अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है । इसके बाद व्रती महिलाएं भोजन ग्रहण करती है ।
बदलते परिवारों के साथ बदली परंपरा
समय के साथ परिवार छोटे होने और जीवनशैली में बदलाव के कारण अब ज्यादातर बहन-बेटियां राखी बांधने के बाद मायके में अधिक दिनों तक नहीं रुकतीं और ससुराल लौट जाती हैं। ऐसे में अब अनेक महिलाएं तीजा पर्व ससुराल में ही मनाती हैं।
तीजा के बाद दधड़ी और जन्माष्टमी का पर्व
सिंधी समाज में तीजा के बाद भी कई परंपरागत पर्व मनाए जाते हैं। राखी के पांचवें दिन दधड़ी पर्व मनाया जाता है। इस दिन ठंडा भोजन करने की परंपरा है। महिलाएं एक दिन पहले शाम को विभिन्न प्रकार के व्यंजन और रोटियां बनाकर रखती हैं। सुबह शीतला माता की पूजा-अर्चना के बाद तालाब, सरोवर या नदी में स्नान कर वहां का जल घर लाने की परंपरा भी है। मान्यता है कि इससे घर में सुख-शांति और शीतलता बनी रहती है। इसके अगले दिन कमरष्ठ का पर्व मनाया जाता है।राखी के आत्वे दिन जन्माष्टमी का पर्व मनाने के बाद से
बेटियां अपने ससुराल लौटती हैं।
तीजा पर्व को लेकर शनिवार को सिंधी समाज की महिलाएं पूजा सामग्री जुटाने से लेकर घर की सजावट, श्रृंगार और अन्य तैयारियों में व्यस्त रहीं। रविवार को महिलाएं दिनभर आस्था और परंपरा के साथ तीजा पर्व मनाएंगी।

