इंद्र कुमार कोटवानी
तिल्दा नेवरा -एक पुरानी कहावत है—”जब राजा निष्क्रिय हो जाता है, तो उसके मंत्री भी निष्क्रिय हो जाते हैं।” यही स्थिति आज तिल्दा-नेवरा शहर की दिखाई देती है। जिम्मेदार लोग अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के बजाय तमाशबीन बने बैठे हैं, और जनता विरोध करने के बजाय मौन धारण किए हुए है।
तिल्दा-नेवरा को समस्याओं का शहर कहना गलत नहीं होगा। यहां गंदगी सड़कों पर बिखरी है, नालियां जाम हैं, टूटी सड़कें हादसों को न्योता दे रही हैं, गलियों की स्ट्रीट लाइटें बंद हैं, सार्वजनिक नलों से टोटियां गायब हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इन समस्याओं से सभी परिचित हैं, लेकिन समाधान की दिशा में कोई ठोस पहल दिखाई नहीं देती।

शहर में बायपास रोड नहीं होने के कारण शाम होते ही स्टेशन चौक से खूबचंद बघेल चौक तक जाम लगना आम बात है। लेकिन इससे भी अधिक गंभीर स्थिति दीनदयाल चौक, दुर्गा मंदिर, हेमू कालानी चौक से अग्रसेन चौक तक के आधा किलोमीटर क्षेत्र की है। यहां सुबह से शाम तक सड़कें पार्किंग स्थल बन जाती हैं।
दुकानदार अपनी दुकानों के सामने ही माल उतारते-चढ़ाते हैं। कई लोग सड़क तक सामान फैला देते हैं, जिससे रास्ता और संकरा हो जाता है। भारी वाहन घंटों खड़े रहते हैं। नतीजा यह होता है कि हर कुछ मिनट में जाम लगता है और आम नागरिकों को भारी परेशानी उठानी पड़ती है।

विडंबना यह है कि इस पूरे मार्ग पर पुलिस की नजर भी है और सीसीटीवी कैमरे भी लगे हैं। फिर भी न तो यातायात व्यवस्था सुधरती है और न ही अतिक्रमण हटाने की गंभीर कार्रवाई होती है। नगर पालिका भी इस दिशा में मौन नजर आती है।
इतनी खराब है कि कई लोग इस मार्ग से गुजरने से बचते हैं। जो स्टेशन पांच मिनट में पहुंच सकते हैं, उन्हें लंबा चक्कर लगाकर दस मिनट में जाना पड़ता है। कई बार लोग ट्रेन तक छोड़ देते हैं।
दुर्भाग्य यह भी है कि यदि कोई नागरिक व्यवस्था पर सवाल उठाता है, तो उसे धमकियों का सामना करना पड़ता है। कोई स्वयं को नेता बताकर धौंस देता है, तो कोई किसी नेता का करीबी होने का दावा करता है। ऐसे माहौल में आम नागरिक चुप रहना ही बेहतर समझता है।
अब सवाल यह है कि आखिर जिम्मेदार कब जागेंगे? क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार किया जा रहा है? प्रशासन, नगर पालिका और पुलिस यदि चाहें तो केवल कुछ दिनों की सख्त कार्रवाई से इस पूरे क्षेत्र की व्यवस्था सुधारी जा सकती है।
तिल्दा-नेवरा को समस्याओं से नहीं, बल्कि जिम्मेदारों की निष्क्रियता से सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है।
अ समय आ गया है कि जिम्मेदार मौन तोड़ें, कानून सड़क पर दिखाई दे और जनता को यह भरोसा मिले कि व्यवस्था केवल कागजों में नहीं, जमीन पर भी मौजूद है।
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