इंदर कोटवानी ..राजस्व विभाग में भ्रष्टाचार के आंकड़े केवल सरकारी कर्मचारियों की गिरफ्तारी का मामला नहीं, बल्कि उस आम आदमी की बेबसी की कहानी हैं, जो अपनी ही जमीन का काम कराने के लिए दफ्तरों के चक्कर काटता है। जब नामांतरण, सीमांकन और राजस्व रिकॉर्ड में सुधार जैसे बुनियादी कामों के लिए रिश्वत मांगने की नौबत आए, तो सुशासन और पारदर्शी प्रशासन के दावों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
विशेष समीक्षा ..
सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार कोई नई बात नहीं है। यह एक ऐसी समस्या है, जिसकी जड़ें लंबे समय से प्रशासनिक व्यवस्था में फैली हुई हैं। लेकिन जब भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करने वाली एजेंसी के आंकड़े ही किसी विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करने लगें, तब उसे सामान्य घटना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
छत्तीसगढ़ में एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) की पांच साल से अधिक की कार्रवाई के आंकड़े ऐसी ही तस्वीर पेश कर रहे हैं। वर्ष 2021 से 28 मई 2026 तक प्रदेश में रिश्वतखोरी के 154 ट्रैप प्रकरण दर्ज हुए, जिनमें 193 अधिकारी-कर्मचारी पकड़े गए। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें सबसे अधिक 56 प्रकरण राजस्व विभाग से जुड़े हैं, जिनमें 67 अधिकारी-कर्मचारी पकड़े गए। स्कूल शिक्षा विभाग 20 प्रकरणों के साथ दूसरे स्थान पर है।
यह आंकड़ा महज एक विभाग का पहले स्थान पर होना नहीं है। यह उस व्यवस्था पर सवाल है, जिसके माध्यम से आम आदमी का सीधा वास्ता पड़ता है। क्योंकि राजस्व विभाग का संबंध किसी खास वर्ग या व्यक्ति से नहीं, बल्कि समाज के लगभग हर परिवार से है।
आखिर राजस्व विभाग में ही सबसे ज्यादा रिश्वतखोरी क्यों?
इस सवाल का जवाब तलाशना जरूरी है। जमीन का नामांतरण कराना हो, सीमांकन करवाना हो, बंटवारा कराना हो, जमीन के रिकॉर्ड में सुधार करवाना हो या किसी किसान को उसकी जमीन से संबंधित प्रमाण पत्र चाहिए हो, हर स्तर पर आम नागरिक को राजस्व विभाग की जरूरत पड़ती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में तो पटवारी और तहसील कार्यालय आम आदमी के लिए सबसे महत्वपूर्ण सरकारी संस्थानों में शामिल हैं। किसान से लेकर जमीन खरीदने वाले व्यक्ति तक, हर किसी को कभी न कभी इन कार्यालयों के दरवाजे पर पहुंचना पड़ता है।
लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति तब बनती है, जब नियमानुसार मिलने वाली सरकारी सेवा के लिए भी व्यक्ति को कथित तौर पर अतिरिक्त रकम देने के लिए मजबूर होना पड़े। कोई अपनी जमीन का नामांतरण कराने के लिए महीनों चक्कर काटता है, कोई सीमांकन के लिए परेशान होता है, तो किसी को राजस्व रिकॉर्ड दुरुस्त कराने के लिए बार-बार कार्यालय जाना पड़ता है।
सवाल यह है कि जब इन कार्यों के लिए शासन ने नियम और समय-सीमा निर्धारित कर रखी है, तो फिर आम आदमी को उसका अधिकार प्राप्त करने में इतनी परेशानी क्यों होती है?
क्या रिश्वतखोरी अब काम कराने की अनकही शर्त बनती जा रही है?
आम जनता के बीच सरकारी कार्यालयों को लेकर एक धारणा बनती जा रही है कि बिना अतिरिक्त पैसे दिए काम आसानी से नहीं होता। यह धारणा हर अधिकारी और कर्मचारी पर लागू नहीं की जा सकती, क्योंकि ईमानदारी से काम करने वाले लोग भी व्यवस्था का हिस्सा हैं। लेकिन जब बार-बार रिश्वतखोरी के मामले सामने आते हैं, तो पूरी व्यवस्था की साख प्रभावित होती है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि कई बार शिकायतकर्ता रिश्वत देना नहीं चाहता, लेकिन अपने जरूरी काम को पूरा कराने के लिए वह खुद को मजबूर महसूस करता है। उसे डर रहता है कि यदि उसने विरोध किया तो उसकी फाइल रोक दी जाएगी, काम में अनावश्यक आपत्ति लगा दी जाएगी या उसे बार-बार कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ेंगे।
ऐसी स्थिति में भ्रष्टाचार केवल आर्थिक अपराध नहीं रह जाता, बल्कि यह आम आदमी के अधिकार, सम्मान और भरोसे पर भी चोट करता है।
सरकार के दावों और जमीनी हकीकत के बीच कितना अंतर?
भारतीय जनता पार्टी की सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस और ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ जैसे संकल्पों की बात करती रही है। यह संकल्प केवल भाषणों और घोषणाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसकी वास्तविक परीक्षा सरकारी कार्यालयों में होनी चाहिए।
यदि किसी विभाग में लगातार रिश्वतखोरी के मामले सामने आ रहे हैं, तो सरकार की जिम्मेदारी केवल एसीबी की कार्रवाई का हवाला देकर समाप्त नहीं हो जाती। यह भी देखना होगा कि संबंधित विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने अपने अधीनस्थ कार्यालयों पर कितना नियंत्रण रखा है।
क्या तहसील स्तर पर होने वाले कामों की नियमित समीक्षा होती है? क्या कलेक्टर और एसडीएम को आम नागरिकों की शिकायतों की वास्तविक जानकारी मिलती है? क्या किसी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ रिश्वत मांगने की बार-बार शिकायत आने पर उसके विरुद्ध विभागीय स्तर पर कार्रवाई होती है?
यदि कार्रवाई केवल तभी होती है, जब कोई व्यक्ति एसीबी तक पहुंचकर ट्रैप की प्रक्रिया पूरी करता है, तो फिर विभागीय निगरानी व्यवस्था की उपयोगिता पर सवाल उठना लाजिमी है।
सरकार को यह भी समझना होगा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का अर्थ केवल रिश्वत लेते हुए किसी कर्मचारी को पकड़ना नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियां पैदा करना है, जिनमें रिश्वत मांगने की गुंजाइश ही कम हो जाए।
गिरफ्तारी के बाद आगे क्या होता है?
एसीबी के आंकड़ों में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है। वर्ष 2021 से 28 मई 2026 तक की अवधि में 154 ट्रैप प्रकरण दर्ज हुए, लेकिन इसी अवधि के उपलब्ध आंकड़ों में केवल छह मामलों में सजा दर्ज होने की जानकारी है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि गिरफ्तारी और दोषसिद्धि अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। हर मामले का अपना जांच और न्यायिक परीक्षण होता है। इसलिए केवल इन आंकड़ों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि बाकी सभी मामलों का क्या परिणाम हुआ। लेकिन यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि लंबित मामलों की स्थिति क्या है? कितने मामलों में चालान पेश हो चुका है? कितने मामलों का न्यायालय में विचारण चल रहा है? और दोष सिद्ध होने पर कितने लोगों को सेवा से बर्खास्त किया गया?
यदि कोई कर्मचारी रिश्वत लेते हुए पकड़ा जाता है, तो उसके विरुद्ध कानूनी प्रक्रिया के साथ विभागीय कार्रवाई की स्थिति भी सार्वजनिक होनी चाहिए। अन्यथा भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की खबरें तो आती रहेंगी, लेकिन आम आदमी को यह भरोसा नहीं हो पाएगा कि दोषियों को अंतिम रूप से जवाबदेह भी बनाया जा रहा है।
समस्या केवल छोटे कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
भ्रष्टाचार की चर्चा होते ही अक्सर पटवारी, लिपिक या निचले स्तर के कर्मचारियों के नाम सामने आते हैं। लेकिन सवाल यह भी है कि किसी कार्यालय में लंबे समय से रिश्वतखोरी की शिकायतें मिल रही हैं, तो वहां के जिम्मेदार वरिष्ठ अधिकारी अपनी जवाबदेही से कैसे बच सकते हैं?
यह मान लेना उचित नहीं होगा कि हर मामले में वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हैं। लेकिन प्रशासनिक जिम्मेदारी का सिद्धांत यही कहता है कि जिस कार्यालय में अनियमितताएं लगातार सामने आएं, वहां के नियंत्रण और निगरानी तंत्र की भी जांच होनी चाहिए।
राजस्व विभाग में सुधार केवल पटवारियों की निगरानी बढ़ाने से नहीं होगा। तहसीलदार, एसडीएम और जिला प्रशासन तक जवाबदेही की एक स्पष्ट व्यवस्था बनानी होगी।
अब सरकार को कुछ ठोस फैसले लेने होंगे।
राजस्व विभाग में रिश्वतखोरी रोकने के लिए सरकार को केवल चेतावनी और जांच के भरोसे नहीं रहना चाहिए। इसके लिए कुछ बुनियादी सुधार जरूरी हैं।
नामांतरण, सीमांकन और बंटवारे जैसे मामलों के निपटारे की समय-सीमा का सख्ती से पालन कराया जाए।
हर आवेदन की ऑनलाइन स्थिति उपलब्ध हो, ताकि आवेदक को फाइल कहां अटकी है, इसकी जानकारी मिल सके।
किस अधिकारी या कर्मचारी के पास कितने मामले लंबित हैं, इसकी नियमित समीक्षा हो।
रिश्वत मांगने की शिकायत पर शिकायतकर्ता को सुरक्षा और गोपनीयता का भरोसा दिया जाए।
बार-बार शिकायतों में नाम आने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों की विभागीय जांच कराई जाए।
एसीबी में दर्ज मामलों की जांच, चालान, न्यायालयीन स्थिति और दोषसिद्धि का विभागवार विवरण सार्वजनिक किया जाए।
ईमानदारी से काम करने वाले कर्मचारियों को प्रोत्साहित किया जाए, ताकि पूरे विभाग की छवि कुछ लोगों की वजह से खराब न हो।
अंत में सबसे बड़ा सवाल जनता के भरोसे का है।
सरकारें बदलती हैं, राजनीतिक दल बदलते हैं, लेकिन आम आदमी की सरकारी कार्यालयों से जुड़ी परेशानियां यदि नहीं बदलतीं तो व्यवस्था में बदलाव का लाभ आखिर किसे मिल रहा
है?किसान को अपनी जमीन का काम कराने के लिए रिश्वत न देनी पड़े, गरीब को प्रमाण पत्र बनवाने के लिए किसी की खुशामद न करनी पड़े और आम नागरिक को अपने ही अधिकार के लिए दफ्तरों में अपमानित न होना पड़े, यही सुशासन की असली पहचान होनी चाहिए।
भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करने वाली एजेंसी ने अपना काम आंकड़ों के रूप में सामने रख दिया है। अब जिम्मेदारी सरकार और विभागीय प्रशासन की है कि इन आंकड़ों को केवल समाचार की सुर्खियां न बनने दिया जाए, बल्कि इन्हें सुधार का आधार बनाया जाए।
‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ का संकल्प तभी सार्थक होगा, जब सरकारी दफ्तरों में बैठा आम आदमी का सेवक रिश्वत मांगने से पहले सौ बार सोचे और जनता को अपना अधिकार पाने के लिए एक भी रुपया अतिरिक्त न देना पड़े।
क्योंकि अंततः जनता को यह नहीं देखना कि कितने कर्मचारी पकड़े गए, जनता यह देखना चाहती है कि उसका काम बिना रिश्वत के कितनी आसानी से हो रहा है।

