इंदर कोटवानी …
क्या छत्तीसगढ़ में नौकरशाही अब बेलगाम और नेताओं से भी ज्यादा ताकतवर हो गई है…? या फिर मान लिया जाय की नौकरशाह अब नेताओं पर भारी पड़ने लगे है…? क्या एक वरिष्ठ सांसद को कथित तौर पर “जो करना है कर लो” कहना सिर्फ एक अधिकारी का व्यवहार था… या फिर इसके पीछे सत्ता के गलियारों की कोई बड़ी सियासी कहानी छिपी है…?
क्या लोकतंत्र में चुना हुआ जनप्रतिनिधि बड़ा है… या नियुक्त अधिकारी…?
और सबसे बड़ा सवाल… जब देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा तक मामला पहुंच जाए… तो क्या यह सिर्फ एक फोन कॉल का विवाद रह जाता है…?
आइए जानते है विवाद की पूरी कहानी… जिसने छत्तीसगढ़ की राजनीति, नौकरशाही और लोकतांत्रिक व्यवस्था—तीनों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
छत्तीसगढ़ के पूर्व गृह मंत्री, पांच बार मंत्री रह चुके और रायपुर से वरिष्ठ सांसद बृजमोहन अग्रवाल तथा स्वास्थ्य सचिव एवं वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अमित कटारिया के बीच कथित फोन विवाद अब केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रहा। मामला अब देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा तक पहुंच चुका है। इस पूरे घटनाक्रम की सबसे दिलचस्प बात यह है कि भाजपा सांसद के समर्थन में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी खुलकर सामने आ गए हैं।जानकारी के मुताबिक, सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने स्वास्थ्य विभाग से जुड़े एक जनहित के विषय पर चर्चा के लिए स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया को फोन किया था।
जैसे की आप और हम सभी जानते है स्वास्थ्य विभाग जैसा संवेदनशील विभाग अस्पताल, मरीज, दवा और करोड़ों लोगों के जीवन से जुड़ा होता है। सांसद का आरोप है कि बातचीत के दौरान अधिकारी का व्यवहार अमर्यादित था और उन्होंने कथित तौर पर कहा— “जो करना है कर लो।”एक अधिकारी भाजपा के कदावर सांसद बृजमोहन अग्रवाल से कहता है. “जो करना है कर लो। अगर सचमुच यह आरोप सही है… तो सवाल केवल एक वाक्य का नहीं है..।
सांसद अग्रवाल ने इसे अपना व्यक्तिगत अपमान नहीं, बल्कि संसद और जनप्रतिनिधियों की गरिमा पर चोट बताया। इसी कारण उन्होंने सीधे लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर आईएएस अधिकारी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन की कार्रवाई की मांग की है। मामले की गंभीरता को देखते हुए लोकसभा सचिवालय ने भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DOPT) से हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में विस्तृत तथ्यात्मक रिपोर्ट तलब की है। यही रिपोर्ट आगे लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष रखी जाएगी।
भारतीय संविधान सांसदों को कुछ विशेषाधिकार इसलिए देता है ताकि वे बिना किसी दबाव के जनता की आवाज उठा सकें। यदि कोई व्यक्ति—चाहे वह कितना भी बड़ा अधिका री क्यों न हो—किसी सांसद के संवैधानिक दायित्वों में बाधा डालता है या ऐसा व्यवहार करता है जिससे संसद की गरिमा प्रभावित होती हो, तो परिस्थितियों के आधार पर उसे विशेषाधिकार हनन के दायरे में देखा जा सकता है। यही वजह है कि यह मामला अब केवल एक फोन कॉल नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था और लोकतांत्रिक मर्यादा का विषय बन गया है।
अब हम बात उस चर्चा की.करेगे .. जो इन दिनों सत्ता के गलियारों में सबसे ज्यादा सुनाई दे रही है।
राजनीतिक हलकों में यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या प्रदेश के वरिष्ठ और प्रभावशाली नेता बृजमोहन अग्रवाल के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव को सीमित करने की कोई कोशिश हो रही है…? हालांकि इस दावे का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण सामने नहीं आया है और न ही किसी स्तर पर इसकी आधिकारिक पुष्टि हुई है। लेकिन राजनीतिक चर्चाओं में यह सवाल बार-बार उठ रहा है कि आखिर एक वरिष्ठ सांसद से कोई अधिकारी इतनी तल्ख भाषा में बात करने का साहस कैसे कर सकता है…?
.इतने बड़े विवाद के बाद मुख्यमंत्री से लेकर किसी मंत्री तक का कोई सार्वजनिक बयान सामने नहीं आया। यहां तक कि बृजमोहन अग्रवाल के करीबी माने जाने वाले कई सांसद और विधायक भी इस मुद्दे पर खुलकर बोलते नजर नहीं आए। जबकि इसके उलट कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भाजपा सांसद के समर्थन में सामने आए।भूपेश बघेल ने कहा कि यदि प्रदेश के इतने वरिष्ठ सांसद के साथ कोई अधिकारी इस तरह बात कर सकता है… तो आम नागरिकों और छोटे जनप्रतिनिधियों के साथ कैसा व्यवहार होता होगा, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है। उन्होंने इसे किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़ा गंभीर सवाल बताया। यानी इस मुद्दे पर सत्ता और विपक्ष पहली बार लगभग एक ही स्वर में दिखाई दे रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है… क्या यह केवल एक अधिकारी का व्यक्तिगत अहंकार था…? या फिर ऐसा माहौल बन चुका है जिसमें कुछ अधिकारी स्वयं को जनप्रतिनिधियों से भी ऊपर समझने लगे हैं…? लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता के पास होती है। जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है। अधिकारी व्यवस्था चलाने के लिए नियुक्त किए जाते हैं।ऐसे में लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल सिद्धांत यही कहता है कि प्रशासनिक व्यवस्था अंततः जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के प्रति जवाबदेह होती है।यदि यही संतुलन कमजोर पड़ने लगे… तो उसका सीधा असर शासन व्यवस्था और आम जनता—दोनों पर पड़ सकता है।
अब हम जानेगे नियम क्या कहते हैं?
DOPT तथा ऑल इंडिया सर्विसेज (कंडक्ट) रूल्स के अनुसार किसी भी आईएएस अधिकारी का दायित्व है कि वह सांसदों और विधायकों के फोन, पत्र तथा मुलाकातों को प्राथमिकता दे।
यदि किसी कारणवश फोन रिसीव नहीं हो पाता तो अधिकारी स्वयं कॉल बैक करेगा।बातचीत का व्यवहार शालीन, सम्मानजनक और पेशेवर होना आवश्यक माना गया है।
यदि इन नियमों का उल्लंघन साबित होता है तो विभागीय कार्रवाई, प्रतिकूल एसीआर और अन्य अनुशासनात्मक कार्रवाई का भी प्रावधान मौजूद है।
अब आगे क्या होगा?
अब पूरा मामला DOPT के स्तर पर तथ्यात्मक जांच के दायरे में है।छत्तीसगढ़ सरकार से विस्तृत रिपोर्ट ली जाएगी।इसके बाद रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष के पास पहुंचेगी।यदि प्रथम दृष्टया विशेषाधिकार हनन का मामला बनता है तो इसे संसद की विशेषाधिकार समिति को भेजा जा सकता है।
समिति सांसद और अधिकारी—दोनों का पक्ष सुनेगी।
फोन कॉल सहित सभी तथ्यों की जांच होगी।यदि अधिकारी दोषी पाए जाते हैं तो बिना शर्त माफी, विभागीय कार्रवाई, सेवा अभिलेख में प्रतिकूल टिप्पणी सहित अन्य अनुशासनात्मक कदमों की सिफारिश की जा सकती है।यदि ऐसा होता है तो यह फैसला देशभर की नौकरशाही के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल भी बन सकता है।
गौरतलब है कि आईएएस अधिकारी अमित कटारिया वर्ष 2015 में भी उस समय राष्ट्रीय चर्चा में आए थे, जब बस्तर कलेक्टर रहते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वागत के दौरान काला चश्मा पहनने को लेकर प्रोटोकॉल विवाद खड़ा हुआ था।फिलहाल इस मामले में कोई अंतिम फैसला नहीं आया है।
जांच प्रक्रिया जारी है…
सच्चाई जांच और संवैधानिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगी।लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है…क्या नौकरशाही और जनप्रतिनिधियों के बीच सम्मान और जवाबदेही का संतुलन कमजोर पड़ रहा है…? या फिर यह केवल एक गलतफहमी है, जिसका सच जांच पूरी होने के बाद सामने आएगा…?
फैसला अब लोकसभा, जांच एजेंसियों और संवैधानिक प्रक्रिया के हाथ में है।
आपकी राय क्या है…?
क्या जनप्रतिनिधियों के प्रति अधिकारियों की जवाबदेही और सख्त होनी चाहिए… या प्रशासनिक स्वतंत्रता को वर्तमान स्वरूप में ही बनाए रखना चाहिए…?अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर लिखिए।

