जिस बेटी को माता-पिता ने अदालत की कुर्सी पर बैठकर न्याय करते देखने का सपना संजोया था, उसने जज बनने की परीक्षा पास कर उस सपने को पूरा भी कर दिया। लेकिन किस्मत को शायद उसकी मंजिल कहीं और मंजूर थी। हाथों में कानून की डिग्री और सामने सुनहरे भविष्य का रास्ता होने के बावजूद इस बेटी ने संसार की चकाचौंध छोड़कर संयम और त्याग का मार्ग चुन लिया। परिवार की आंखें नम थीं, समाज भावुक था और पूरा शहर इस अनोखी विदाई का गवाह बना। यह कहानी है मध्य प्रदेश के बैतूल की प्रखरश्री दीदी की, जिनकी विदाई विंटेज कारों और शाही बग्घियों के साथ किसी राजसी समारोह से कम नहीं थी।
बैतूल।मध्य प्रदेश के बैतूल में जैन समाज की ओर से एक ऐसा अनोखा और भावुक आयोजन किया गया, जिसने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। जज की परीक्षा पास करने के बाद न्यायिक सेवा में नियुक्ति से पहले ही प्रखरश्री दीदी ने सांसारिक जीवन का त्याग कर जैन दीक्षा लेने का निर्णय लिया। उनके साथ चार अन्य दीक्षार्थी बहनों की भी भव्य बिनौली निकाली गई। इस दौरान विंटेज कारों का काफिला, शाही बग्घियां और राजस्थान के उदयपुर से पहुंचे बैंड ने आयोजन को खास बना दिया।

बैतूल की सड़कों पर निकले इस भव्य चल समारोह में बड़ी संख्या में जैन समाज के लोग और श्रद्धालु शामिल हुए। जगह-जगह पांचों दीक्षार्थी बहनों का फूल-मालाओं से स्वागत किया गया। जयकारों के बीच जहां समाज में उत्साह का माहौल था, वहीं परिवार के सदस्यों के लिए यह पल भावनाओं से भरा रहा।
प्रखरश्री दीदी ने बताया कि उनके माता-पिता का सपना था कि वह जज बनें। उन्होंने न्यायिक सेवा की परीक्षा पास कर माता-पिता के इस सपने को पूरा भी किया, लेकिन बचपन से ही उनके मन में वैराग्य का भाव था। उनका मानना है कि जज या वकील बनकर वह समाज की जितनी सेवा कर सकती हैं, उससे कहीं व्यापक सेवा महावीर स्वामी के बताए मार्ग पर चलकर कर सकती हैं। इसी भावना से उन्होंने जैन दीक्षा लेने का निर्णय लिया।

बैतूल सकल जैन समाज के सहयोग से आयोजित इस बिनौली में विंटेज कारों का काफिला, आकर्षक शाही बग्घियां और उदयपुर से आया बैंड विशेष आकर्षण का केंद्र रहे। भक्ति, उत्साह और श्रद्धा के बीच पांचों दीक्षार्थी बहनों का अभिनंदन किया गया।
चल समारोह शहर के विभिन्न मार्गों से होते हुए जैन दादावाड़ी पहुंचा, जहां पांचों दीक्षार्थी बहनों की गोदभराई की पारंपरिक रस्म निभाई गई। इस दौरान दीक्षार्थी रंगोली दीदी ने बताया कि यह उनके सांसारिक जीवन की अंतिम विदाई है। फिलहाल उन्होंने रंगीन वस्त्र धारण किए हैं, लेकिन दीक्षा के बाद वे सफेद वस्त्र पहनेंगी।

जानकारी के मुताबिक, प्रखरश्री दीदी सहित पांचों बहनें 22 नवंबर को जैन दीक्षा ग्रहण करेंगी। इससे पहले परिवार और जैन समाज ने उनके सम्मान में यह भव्य बिनौली आयोजित कर उन्हें भावुक विदाई दी।
एक तरफ जज की कुर्सी, सम्मान और सुरक्षित भविष्य था, तो दूसरी तरफ त्याग, तपस्या और आध्यात्मिक जीवन का कठिन मार्ग। प्रखरश्री दीदी ने अपनी मंजिल के लिए दूसरा रास्ता चुना। यह विदाई सिर्फ एक बेटी के घर से विदा होने की कहानी नहीं, बल्कि उसकी अपनी आस्था और संकल्प के साथ नई आध्यात्मिक यात्रा शुरू करने का अवसर है।

