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खाकी पर फिर गंभीर सवाल…! छत्तीसगढ़ में पुलिस की वर्दी एक बार फिर सवालों के घेरे में है…

इंदर कोटवानी ..

छत्तीसगढ़ की खाकी पर एक बार फिर आरोपों का काला दाग लगा है..जिस वर्दी को देखकर आम आदमी सुरक्षा का भरोसा करता है…
आज वही वर्दी एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। आरोप राजनांदगांव की 8वीं बटालियन में पदस्थ एडिशनल एसपी केबी सिंह पर लगे हैं…
आरोप है कि  केबी सिंह ने 17 साल की एक नाबालिग बच्ची को अपने पास रखा… और उसके परिजनों को गुमराह किया जाता रहा…इसी बीच  बच्ची करीब 10 दिन तक लापता रही।…परिवार उसे तलाशता रहा…पुलिस ने भी तलाश शुरू की।.. जांच आगे बढ़ी… बाद में एडिशनल एसपी खुद उसी नाबालिग बच्ची को लेकर दुर्ग पुलिस कंट्रोल रूम पहुंच गए।और यहीं से इस पूरे मामले में सवालों की संख्या और बढ़ गई । अब सवाल ये है … आखिर बच्ची थी कहां?……

खाकी पर सवाल… सवाल सिर्फ एक अफसर पर नहीं, पूरे सिस्टम पर है!  छत्तीसगढ़ की पुलिस…जिस वर्दी को देखकर आम आदमी सुरक्षा का भरोसा करता है…
आज वही वर्दी एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है।.लेकिन इस बार सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि एक एडिशनल एसपी पर क्या आरोप लगे हैं…सवाल यह है कि पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी पर लगे गंभी र आरोपों की जांच किस नजर से होगी?

जो पुलिस किसी आम नागरिक के मामले में अपनाती है?..या फिर वर्दी के सामने जांच का पैमाना बदल जाएगा?..क्योंकि इस बार मामला बेहद संवेदनशील है।
एक 17 साल की नाबालिग बच्ची…जो 10 दिन तक लापता रही…परिवार उसे तलाशता रहा…
और जब जांच आगे बढ़ी तो बच्ची के एक पुलिस अधिकारी के संपर्क में होने की जानकारी सामने आई।…आरोप है कि बच्ची एडिशनल एसपी केबी सिंह के तालपुरी स्थित घर पर काम करती थी।….परिजनों का दावा है कि कथित दुर्व्यवहार के बाद उसने काम छोड़ दिया था।….और फिर 30 अगस्त को बच्ची लापता हो गई।
चार सितंबर को गुमशुदगी की शिकायत दर्ज हुई।…पुलिस ने नाबालिग की तलाश शुरू की।
पुलिस अधिकारी के घर तक पहुंची…लेकिन बच्ची वहां नहीं मिली।
फिर जांच आगे बढ़ी… जाँच में अधिकारी की साली का नाम सामने आया…पुलिस सेक्टर-8 स्थित उस महिला के घर में पहुंची तो …वहां अधिकारी की साली से पुलिस का विवाद  हो गया ……
पुलिस के मुताबिक महिला ने मिट्टी का तेल और माचिस अपने पास रख ली और रोकने की कोशिश के दौरान एक पुलिसकर्मी की उंगली काट दी। पुलिस महिला को गिरफ्तारकर लिया
लेकिन… कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
महिला की गिरफ्तारी के बाद एडिशनल एसपी खुद उसी नाबालिग बच्ची को लेकर दुर्ग पुलिस कंट्रोल रूम पहुंच गए।और यहीं से इस पूरे मामले में सवालों की संख्या और बढा दिया।
आखिर बच्ची थी कहां?….वह एडिशनल एसपी के संपर्क में कैसे थी?…परिवार को इसकी जानकारी क्यों नहीं थी?…10 दिनों तक बच्ची की स्थिति क्या थी?
और सबसे महत्वपूर्ण…अगर अधिकारी की भूमिका पूरी तरह सामान्य और कानून सम्मत थी, तो इस पूरे घटनाक्रम की जरूरत क्यों पड़ी?

लेकिन यहां एक बात  महत्वपूर्ण है।आरोप और अपराध सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं।..अभी किसी को दोषी नहीं कहा जा सकता।..बच्ची बरामद हो चुकी है।
उसकी काउंसलिंग हो रही है।..उसके बयान लिए जा रहे हैं।…..और अब सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य वही होंगे।
यानी…
इस कहानी का सच आरोपों से नहीं, जांच और बयान से सामने आएगा।..लेकिन अब इस घटना को एक बड़े परिप्रेक्ष्य में देखिए।
यह पहली बार नहीं है जब छत्तीसगढ़ में किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं।
करीब आठ साल पहले तत्कालीन आईजी और वर्तमान एडीजी पवन देव पर एक महिला कांस्टेबल ने यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाए थे।
मामले की जांच विशाखा समिति तक पहुंची।…मामला हाईकोर्ट गया।..फरवरी 2018 में हाईकोर्ट ने कार्रवाई को लेकर निर्देश दिए। लेकिन हाईकोर्ट के निर्देश दोषी पे जाने के बाद कोई कार्रवाई नही हुई आज पवन देव जी ADG के पद पर कार्यरत है ..यानी उस समय भी सवाल सिर्फ आरोपों के नहीं थे…सवाल था कि पुलिस महकमे के भीतर किसी वरिष्ठ अधिकारी पर आरोप लगे तो व्यवस्था किस तरह प्रतिक्रिया देती है।

इसके बाद 2025 में आईजी रतनलाल डांगी पर एक सब-इंस्पेक्टर की पत्नी ने गंभीर आरोप लगाए।डांगी ने आरोपों से इनकार किया और महिला पर ब्लैकमेलिंग के आरोप लगाए।
मामला विभागीय जांच तक पहुंचा। और मार्च 2026 में डांगी के निलंबन की कार्रवाई सामने आई।अब मामला हाईकोर्ट में है ..एक और मामला डीएसपी कल्पना वर्मा से जुड़ा सामने आया, जिसमें गंभीर आरोपों की जांच हुई और रिपोर्ट गृह विभाग तक पहुंची।..इन मामलों के तथ्य और परिस्थितियां अलग-अलग हैं।
इनमें आरोप लगाने वाले और आरोपों से इनकार करने वाले दोनों पक्ष हैं।..इसलिए इन्हें एक ही तराजू में तौलना सही नहीं होगा।
लेकिन इन सभी मामलों से एक बड़ा सवाल जरूर पैदा होता है।…जब पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी ही आरोपों के घेरे में आते हैं…
तो क्या पुलिस विभाग के पास ऐसी स्वतंत्र व्यवस्था है, जिस पर आम आदमी आंख बंद करके भरोसा कर सके?
यही असली सवाल है।
अब हम कानून की बात.करेगे ..
किसी नाबालिग के मामले में सबसे महत्वपूर्ण चीज उसकी सुरक्षा और कानूनी अभिरक्षा है।भारतीय न्याय संहिता में बच्चे को वैध संरक्षक की अभिरक्षा से उसकी सहमति के बिना बाहर ले जाने या बहलाने से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं।इसलिए अगर जांच में यह सामने आता है कि किसी व्यक्ति ने कानून के विपरीत नाबालिग को उसकी अभिरक्षा से बाहर रखा या ले गया…तो मामला गंभीर कानूनी कार्रवाई तक पहुंच सकता है।

लेकिन यहां भी फैसला आरोप के आधार पर नहीं…साक्ष्य के आधार पर होगा।
और यही वजह है कि इस मामले में पुलिस की जांच सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है।

अब सबसे बड़ा सवाल — जांच कौन करेगा?..मान लीजिए आरोपी कोई आम नागरिक होता…तो पुलिस उसके खिलाफ जांच करती।
उसके घर पर दबिश पड़ती।..पूछताछ होती।..जरूरत पड़ने पर गिरफ्तारी होती।
कानूनी धाराएं लगतीं।….लेकिन यहां आरोप पुलिस के ही एक वरिष्ठ अधिकारी पर हैं।

इसलिए जनता का सवाल बिल्कुल स्वाभाविक है—क्या आरोपी पुलिस अधिकारी होने के कारण जांच की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है?
क्या जांच अधिकारी स्वतंत्र होकर काम कर पाएगा?..क्या नाबालिग बिना किसी दबाव के बयान दे पाएगी?..क्या परिवार खुलकर अपनी बात रख पाएगा?
और अगर जांच में आरोप सही पाए जाते हैं…तो क्या कार्रवाई उसी तरह होगी, जैसे किसी आम आरोपी के खिलाफ होती है?
यही वह बिंदु है जहां से मामला सिर्फ क्राइम स्टोरी नहीं रह जाता…यह सिस्टम की विश्वसनीयता का मामला बन जाता है।
और यहां एक बात पुलिस के पक्ष में भी कहनी होगी…निष्पक्ष जांच का मतलब यह भी है कि सिर्फ आरोप लगने से किसी पुलिस अधिकारी को दोषी नहीं माना जा सकता।
अगर आरोप गलत हैं…तो जांच के बाद अधिकारी को भी पूरी तरह अपना पक्ष रखने और कानून के तहत सम्मान पाने का अधिकार है।
लेकिन अगर आरोप सही हैं…तो वर्दी किसी भी सूरत में ढाल नहीं बननी चाहिए। क्योंकि कानून की ताकत इसी में है कि वह व्यक्ति देखकर नहीं, अपराध देखकर कार्रवाई करे।
तो इस पूरे मामले का विश्लेषण क्या कहता है?

“17 साल की बच्ची दस दिन तक कहां थी?”
सवाल यह भी है—
“वह किन परिस्थितियों में वहां थी?”
सवाल यह भी है—
“परिवार को उसकी जानकारी क्यों नहीं थी?”
और सवाल यह भी है—
“पुलिस अधिकारी की भूमिका क्या थी?”
इन सवालों का जवाब किसी प्रेस नोट से नहीं मिलेगा।
इनका जवाब मिलेगा—नाबालिग के बयान से, जांच से और साक्ष्यों से।
और यही वजह है कि अब इस मामले में सबसे ज्यादा निगाहें पुलिस पर नहीं…
पुलिस की जांच पर हैं।
क्योंकि…
खाकी की ताकत सिर्फ उसकी वर्दी में नहीं होती…उसकी असली ताकत जनता के भरोसे में होती है।और जब उसी खाकी पर सवाल उठे…
तो जांच ऐसी होनी चाहिए…जिस पर आरोपी भी भरोसा करे, पीड़ित भी भरोसा करे और जनता भी।
यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है…और यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा विश्लेषण।

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