इंदर कोटवानी
बालोद -छत्तीसगढ़ के बालोद जिले से आई ये तस्वीरें सिर्फ एक हादसे की नहीं…बल्कि उस सिस्टम की सच्चाई हैं… जहां मजदूरों की जिंदगी की कीमत आज भी बेहद सस्ती मानी जाती है। दल्लीराजहरा में सीवरेज पाइपलाइन बिछाने का काम चल रहा था10 फीट गहरे गड्ढे में मजदूर अपनी मेहनत से शहर की सुविधा तैयार कर रहे थे…लेकिन उन्हें क्या पता था कि यही गड्ढा उनकी कब्र बन जाएगा।
अचानक मिट्टी भरभराकर गिरी…और देखते ही देखते तीन मजदूर जिंदा दफन हो गए। चीखें गूंजती रहीं…लोग दौड़ते रहे…लेकिन मौत उन मजदूरों को अपने साथ ले गई। मरने वालों में दो पुरुष और एक महिला मजदूर शामिल हैं। किशुन कुमार… राकेश कुमार… और बैशाखिन…तीनों अपने परिवार का पेट पालने निकले थे…जिस मजदूर ने दिन-रात मेहनत कर इमारतें खड़ी कीं…जिसने अपने बच्चों के भविष्य के लिए पसीना बहाया…आज उसी मजदूर की लाश घर पहुंची है। पीछे छूट गए रोते-बिलखते बच्चे… बेबस पत्नी… और बूढ़े मां-बाप।
सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर इतनी गहरी खुदाई में सुरक्षा इंतजाम कहां थे…?क्या मजदूरों की जान बचाने के लिए कोई मानक नहीं थे…?क्या बिना बैरिकेडिंग… बिना सुरक्षा उपकरण… बिना मिट्टी रोकने की व्यवस्था के मजदूरों को मौत के गड्ढे में उतार दिया गया था…?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि निर्माण कार्य में भारी लापरवाही बरती गई।अगर सुरक्षा के इंतजाम होते…अगर जिम्मेदार लोग अपनी ड्यूटी निभाते…तो शायद आज तीन परिवार बर्बाद नहीं होते।घटना के बाद प्रशासन… पुलिस… और बीएसपी के अधिकारी मौके पर पहुंचे…जांच की बात कही जा रही है…मुआवजे की चर्चा भी शुरू हो चुकी है…लेकिन सवाल वही है…
आखिर कब तक मजदूर यूं ही मरते रहेंगे…?कब तक गरीबों की जान की कीमत सिर्फ मुआवजे में तय होती रहेगी…?और कब तक हादसों के बाद जिम्मेदार लोग जांच के नाम पर बचते रहेंगे…?हर बार मौत होती है…हर बार मुआवजा घोषित होता है…और हर बार कुछ दिनों बाद मामला ठंडा पड़ जाता है।लेकिन उन बच्चों से कोई पूछे…जिनके सिर से पिता का साया उठ गया…उन परिवारों से कोई पूछे…जिनका सहारा हमेशा के लिए मिट्टी में दब गया। जरूरत सिर्फ संवेदना की नहीं…बल्कि जिम्मेदार लोगों पर सख्त कार्रवाई की है…ताकि अगली बार कोई मजदूर काम पर जाए…तो घर वापस जिंदा लौट सके

