सवा महीने पहले बना पुल पहली बारिश में दरका, उपसरपंच ने जांच की मांग की; ग्रामीण बोले- बाढ़ आई तो बह जाएगी पूरी पुल
तिल्दा-नेवरा विकासखंड के ग्राम भुरसुदा में करीब 20 लाख रुपए की लागत से निर्मित पुल पहली ही बारिश में सवालों के घेरे में आ गई है। सवा महीने पहले तैयार हुई यह पुल पहली तेज बारिश के बाद ही झुक गई और उसमें बड़ी-बड़ी दरारें पड़ गईं। मामले को लेकर ग्रामीणों और उपसरपंच ने निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठाते हुए भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं तथा निष्पक्ष जांच की मांग की है।
ग्राम पंचायत भुरसुदा और गुजरा के बीच नाले पर बनी इस पुल की मांग ग्रामीण लंबे समय से कर रहे थे। बारिश के दौरान किसानों और ग्रामीणों को खेतों तक पहुंचने में भारी परेशानी होती थी, जिसे देखते हुए पुल निर्माण के लिए 20 लाख रुपए की स्वीकृति मिली थी। पंचायत ने ठेकेदार के माध्यम से लगभग 15 मीटर लंबी पुल का निर्माण कराया, लेकिन निर्माण पूरा होने के कुछ ही समय बाद पहली बारिश में ही पुल की सड़क धंस गई और कई जगह चौड़ी दरारें दिखाई देने लगीं।

उपसरपंच राजेश नायक
उपसरपंच राजेश नायक का आरोप है कि उन्होंने पुल निर्माण की गुणवत्ता को लेकर पहले ही जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) को लिखित शिकायत दी थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। उनका कहना है कि शिकायत के बाद भी निर्माण एजेंसी को भुगतान कर दिया गया और बाद में दरारों को छिपाने के लिए रातों-रात सीमेंट और कंक्रीट से प्लास्टर कर लीपापोती कर दी गई।
ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत की निर्वाचित सरपंच महिला हैं, लेकिन अधिकांश कार्य उनके पति और पुत्र द्वारा संचालित किए जाते हैं। उनका कहना है कि निर्माण कार्य में गुणवत्ता की अनदेखी की गई है और यदि नाले में तेज बाढ़ आई तो यह पुल ज्यादा देर टिक नहीं पाएगी।मामले को लेकर गांव में नाराजगी बढ़ती जा रही है। ग्रामीणों ने निर्माण कार्य की तकनीकी जांच कर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है।

फोटोउप सरपंच
उप सरपंच ने बताया कि पहली बारिश के दौरान बहकर आया पेड़-पौधों का कचरा और झाड़ियां पुल के नीचे बनाए गए पानी निकासी मार्ग में फंस गईं। उनका कहना है कि पुल के नीचे बनाया गया सीमेंटेड जल निकासी मार्ग (वेंट) काफी छोटा है, जिसके कारण पानी का बहाव बाधित हो जाता है। नतीजतन पानी पुल के ऊपर तक चढ़ने लगता है और इससे पुल पर अतिरिक्त दबाव बनता है। ग्रामीणों का दावा है कि यदि तेज बारिश या बाढ़ की स्थिति बनी तो यह पुल कभी भी क्षतिग्रस्त होकर बह सकता है।ग्रामीणों ने पूरे निर्माण कार्य की उच्च स्तरीय तकनीकी जांच कराने तथा निर्माण एजेंसी, पंचायत के जिम्मेदार लोगों और गुणवत्ता प्रमाणित करने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते जांच नहीं हुई तो भविष्य में यह पुल किसी बड़े हादसे का कारण बन सकती है।

उठ रहे बड़े सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि पहली ही बारिश में क्षतिग्रस्त हो चुकी इस पुल का निर्माण कार्य आखिर किस गुणवत्ता मानक के आधार पर पूरा माना गया? यदि निर्माण में गंभीर खामियां थीं, तो जनपद पंचायत के संबंधित इंजीनियरों और जिम्मेदार अधिकारियों ने इसका परीक्षण कर इसे स्वीकृति कैसे दे दी? अब ग्रामीणों की मांग है कि पूरे मामले की निष्पक्ष तकनीकी जांच कराई जाए और यदि निर्माण में लापरवाही या भ्रष्टाचार सामने आता है तो ठेकेदार के साथ-साथ जिम्मेदार अधिकारियों पर भी कार्रवाई की जाए।

