भूमि पूजन और लोकार्पण कार्यक्रम में पहुंचीं जिला पंचायत सदस्य शैल महेंद्र साहू, लेकिन शिलालेख पर नाम नहीं मिलने से जताई नाराजगी; कांग्रेस ने भी साधा निशाना
तिल्दा-नेवरा। भारतीय जनता पार्टी भले ही 2028 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए संगठन में एकजुटता और समन्वय का संदेश देने में जुटी हो, लेकिन तिल्दा-नेवरा के ग्राम सरोरा में आयोजित सरकारी भूमि पूजन एवं लोकार्पण कार्यक्रम ने इन दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कार्यक्रम के बाद शिलालेख पर नामों को लेकर ऐसा विवाद खड़ा हुआ कि क्षेत्र में भाजपा की कथित गुटबाजी खुलकर चर्चा का विषय बन गई।

गुरुवार को क्षेत्रीय विधायक एवं राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा ने ग्राम सरोरा में लगभग 1 करोड़ 60 लाख रुपये की लागत से बनने वाले स्टेडियम, 10 लाख रुपये की लागत से बनने वाले स्कूल आहाता का भूमि पूजन तथा आंगनबाड़ी भवन का लोकार्पण किया। कार्यक्रम में कई जनप्रतिनिधि और भाजपा पदाधिकारी मौजूद रहे।
विवाद तब शुरू हुआ जब क्षेत्र की निर्वाचित जिला पंचायत सदस्य एवं जिला पंचायत में महिला एवं बाल विकास विभाग की सभापति शैल साहू कार्यक्रम में पहुंचीं। बताया जा रहा है कि उन्हें कार्यक्रम की आधिकारिक सूचना नहीं दी गई थी। जब उन्होंने शिलालेख देखा तो उसमें अपना नाम नदारद मिला, जबकि जिला पंचायत अध्यक्ष, सरपंच, उपसरपंच, जनपद सदस्य सहित कई अन्य जनप्रतिनिधियों के नाम के साथ नगर पालिका अध्यक्ष का नाम दर्ज थे।

कार्यक्रम समाप्त होने के बाद शैलमहेंद्र साहू के समर्थकों ने खुलकर नाराजगी जताई। उनका आरोप है कि क्षेत्र में बढ़ती लोकप्रियता के कारण जानबूझकर उन्हें कार्यक्रम से दूर रखने और शिलालेख से नाम हटाने की कोशिश की गई। सेल साहू के प्रतिनिधि शरद राजपूत .पंच शेखर शर्मा सहित समर्थकों ने इसे एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि का सार्वजनिक अपमान बताया।
खुद शैल महेंद्र साहू ने कहा कि वह महिला एवं बाल विकास विभाग की जिला पंचायत सभापति हैं और आंगनबाड़ी भवन के लोकार्पण कार्यक्रम में भी उनका नाम नहीं होना समझ से परे है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि पूरे मामले को जिला पंचायत की बैठक में उठाया जाएगा तथा संबंधित अधिकारियों की शिकायत विभागीय मंत्री से भी की जाएगी।
इधर कांग्रेस ने भी इस मुद्दे को हाथोंहाथ लिया। कांग्रेस ले वरिष्ठ नेताशेलेस नितिन त्रिवेदी ने तंज कसते हुए कहा कि जो पार्टी अपने ही जनप्रतिनिधियों को सम्मान नहीं दे पा रही, वह संगठन में एकजुटता और सुशासन का दावा कैसे कर सकती है।
सियासी गलियारों में अब सबसे बड़ा सवाल यही गूंज रहा है—क्या यह महज प्रशासनिक चूक थी या फिर भाजपा की अंदरूनी गुटबाजी की एक और झलक? यदि यह केवल भूल थी तो जिम्मेदार कौन है, और यदि जानबूझकर ऐसा किया गया तो क्या भाजपा अपने ही निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के सम्मान की रक्षा कर पाएगी?
समापन:
एक ओर भाजपा मिशन-2028 के लिए कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों को साथ लेकर चलने की रणनीति की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर सरोरा का यह शिलालेख यह सवाल छोड़ गया है कि जब अपने ही जनप्रतिनिधियों को सम्मान देने में चूक हो जाए, तो संगठनात्मक एकजुटता के दावे आखिर कितने मजबूत माने जाएं? अब सबकी निगाह इस बात पर है कि पार्टी इस विवाद को कैसे सुलझाती है और जिम्मेदारी किसकी तय होती है।

