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शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने किया चतुरंगिणी सेना का गठन; टोको, रोको, ठोको के सिद्धांत पर करेगी काम

गौ हत्या, ब्राह्मणों पर अत्याचार और सनातन की रक्षा को लेकर बनाया संगठन, ऐसे करेगा काम

वाराणसी: शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने सोमवार को लखनऊ में किए गए ऐलान के संदर्भ में गौ हत्या, ब्राह्मणों पर अत्याचार और सनातन की रक्षा को लेकर चतुरंगिणी सेना का गठन कर दिया है. बताया कि यह सेना टोको, रोको और ठोको के सिद्धांत पर काम करेगी, जिसका उद्देश्य हिंदुओं और गाय पर होने वाले अत्याचार को रोकना है. फिलहाल इस सेना में 27 लोगों की नियुक्ति की गई है.

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने काशी में बताया कि यह सेना सनातन और सनातनियों की अभिभावक के रूप में कार्य करेगी, जिसका मुख्य उद्देश्य हिंदू समाज के भीतर से भय को नष्ट करना है, ताकि किसी भी सनातनी को अन्याय का सामना न करना पड़े. लोग समाज में बिना संकोच और बिना डर के अपनी सहभागिता सुनिश्चित करें. उन्होंने कहा कि जब समाज को यह विश्वास होगा कि उसके पीछे एक सुगठित और शस्त्र-शास्त्र संपन्न सैन्य बल खड़ा है, तभी वह निर्भीक होकर धर्म पथ पर अडिग रह सकेगा.

शंकराचार्य ने बताया कि चतुरंगिणी सेना में 27 लोगों को आज शामिल किया गया है. यह सेना प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए 10 महीने में पूरी तरह से धरातल पर उतरकर वचनबद्ध तरीके से कार्य करेंगी. हिंदुओं के मन में इस समय भय उत्पन्न हो गया है. वह सच नहीं बोल पा रहे हैं, सच के साथ खड़े नहीं हो पा रहे हैं, उनकी मजबूरी हो गई है कि वे झूठ का समर्थन करें. उन्हें इस भय से मुक्ति दिलाने के लिए इस सेना का गठन किया जा रहा है.

उन्होंने बताया कि इसका सिद्धांत निर्बल का बल बनना है और उसके लिए तरीका टोको, रोको नहीं तो ठोको. टोको का मतलब है कि लोगों को गलत करने से टोकना पड़ेगा, यदि टोकने के बाद वह नहीं मानते हैं तो रोकना पड़ेगा और रोकने पर भी नहीं मानते हैं तो ठोको. उन्होंने बताया कि ठोको का मतलब सीधे उसपर प्रहार करना नहीं है, उसके ऊपर लिखित रूप से शिकायत करना, पंचायत करना जैसे जितने भी संविधान प्रदत्त अधिकार है, वह आरंभ कर दिए जाएंगे.

बताया कि इस सेना के पास फरसा होगा और यह फरसा परशुराम जी का शस्त्र है. उन्होंने बताया कि परशुराम तपस्या करते थे, लेकिन उनके आश्रम में गाय थी और सहस्त्रर्जुन नामक राजा गायों को सताने लगा और गायों के दुख को दूर करने के लिए ऋषि पुत्र होकर भी भगवान परशुराम ने फरसे का इस्तेमाल किया, उसी का प्रतीक हमने इसे चुना है.

केदारनाथ में गैर हिंदुओं के प्रवेश की रोक पर शंकराचार्य ने कहा कि वहां गैर हिंदुओं को जाना भी नहीं चाहिए. मक्का-मदीना के आसपास गैर हिंदुओं का प्रवेश निषेध है तो ऐसे में केदारनाथ हमारा भी पवित्र स्थान है और हमारी भावनाओं को भी ध्यान में रखते हुए गैर हिंदुओं के प्रवेश को रोका जाना सही फैसला है.

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