तिल्दा नेवरा के केवट पारा में आयोजित संगीतमय श्रीमद् भागवत महापुराण कथा का शनिवार को गीता सार, गीता हवन, सहस्त्रधारा, कपिला तर्पण और हवन यज्ञ के बाद समापन हुआ। इसमें बड़ी संख्या में भक्तगण शामिल हुए।
कथा के अंतिम दिवस रविवार को कथा वाचक दीदी सोनम तिवारी ने कथा वाचक दीदी सोनम तिवारी ने गीता की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने युद्ध के पहले दुर्योधन और भगवान कृष्ण के संवाद का उदाहरण देते हुए कहा कि जब बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, तो भगवान की बातें भी समझ में नहीं आतीं। दुर्योधन ने साफ कहा था कि उन्हें मालूम है कि धर्म क्या है, लेकिन वह धर्म की राह में चलना नहीं चाहते। जब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी सेना और स्वयं में से किसी एक को चुनने का मौका दुर्योधन और अर्जुन को दिया, तो दुर्योधन ने तपाक से सेना को लेना स्वीकारा, जबकि अर्जुन ने कहा कि जिसके साथ प्रभु होंगे उसे किसी सेना की जरूरत नहीं पड़ेगी।

गीता सार के18 अध्याय के बारे में बताते दीदी ने हुए कहा कि सांसारिक मोह,माया के कारण मनुष्य अपने कर्तव्य से विमुख हो जाता है लेकिन मनुष्य को कर्तव्य का पालन करना चाहिए। शरीर नाशवान है लेकिन आत्मा अमर है। निष्काम काम से भाव पूर्वक काम केवल दूसरों के लिए काम करना चाहिए, इससे मनुष्य का कल्याण होता है उन्होंने कहा निःस्वार्थ भाव से मनुष्य को कर्म करना चाहिए। मनुष्य को अनुकूल परिस्थितियों में जीवन जीना चाहिए, क्योंकि सुख और दुख आते रहते हैं। सबके शरीर में भगवान का दर्शन करना चाहिए अर्थात सबमें भगवान है। श्रीमद्भागवत महापुराण कोई अछूता नहीं है।
उन्होंने बताया गया कि मरने के समय मनुष्य जो भाव सुमरन करेगा, उसी भाव को प्राप्त करेगा। सभी मनुष्य भागवत प्राप्ति के अधिकारी हैं। दसवें अध्याय में बताया गया कि संसार में जहां सुंदरता विलक्षणता दिखे, उसको भगवान का स्वरूप मानकर स्वीकार करना चाहिए। जगत को भगवान का स्वरूप मानना है। जो व्यक्ति शरीर इंद्रिय, मन,बुद्घि भगवान को अर्पण कर देता है, वही भगवान को प्रिय होता है उन्होंने बताया गया कि संसार में परमात्मा को जो जान लेता है वह भव रूपी बंधन से छूट जाता है।दीदी कहा सत, रज, तम गुणों से विलुप्त होने जाने पर व्यक्ति परमात्मा को प्राप्त कर लेता है। संसार का मूल आधार परम पूज्य परमात्मा है उसका भजन करना चाहिए। दुर्गुण और दुराचार करने वाले से मनुष्य 84 लाख योनियों में भटकता है इसलिए अधर्म और पाप के रास्ते पर नहीं चलना चाहिए। श्रद्घा पूर्वक जो भी कार्य करें सब भगवान को समर्पित करना चाहिए। गीता का सार ही भगवान है। गीता दान करने के बाद हवन यज्ञ हुआ और महाप्रसाद का वितरित किया गया।श्रीमद् भागवत कथा का गीता पाठ, हवन-पूजन के साथ समापन हुआ।

