तिल्दा नेवरा -होलिका दहन के साथ रंगोत्सव शुरू हो गया है।छत्तीसगढ़ में जगह-जगह रविवार की देर शाम होलिका दहन के साथ ही रंगो का पर्व होली शुरू हो गई है। तिल्दा नेवरा में जहां गोबर के कंडों की होली जलाई गई तो वहीं महासमुंद में चुनाव को लेकर ‘प्रलोभन दहन’ किया गया।जगह-जगह फाग महोत्सव के साथ रंग गुलाल उड़ाया जा रहा है। तिल्दा सिन्धी कैम्प वेद 16 में पार्षद विकास कोटवानी के अगुवाई में समाज के उत्साही युवको द्वारा कंडों और गोकाष्ठ की लकड़ियों से बुराई की प्रतीक होलिका का दहन किया।विकास कोटवानी ने बताया कि पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से होली लकड़ियों को नहीं जलाना चाहिए।इसलिए उन्होंने गोबर के कंडों और गोकाष्ठ की लकड़ियों से बुराई की प्रतीक होलिका का दहन किया।वार्ड 16 में सिन्धी समाज के द्वारा 50 सालो से होलिका दहन किया जाता है।
तिल्दा नेवरा में अलग-अलग आयोजन समितियां और सामाजिक संस्थाओं ने होलिका दहन किया।तिल्दा शहर के केसरवानी पर, मुभठा परा. तिल्दा बस्ती,नेवरा बस्ती,सासहोली जैसे इलाकों सहित 50 से भी अधिक जगह होलिका दहन किया गया।
महासमुंद में अनोखा होलिका दहन
महासमुंद में मतदाताओं को चुनाव के दौरान प्रलोभान से बचने और उनसे दूर रहने के लिए प्रलोभन दहन कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें जिला प्रशासन ने मतदाता जागरूकता कार्यक्रम स्वीप के तहत यह चुनाव प्रक्रिया में निष्पक्ष मतदान करने का संदेश दिया। साथ ही किसी भी तरह के प्रलोभनों से दूर रहने की अपील की।
होलिका दहन की पौराणिक कथा
होलिका दहन की सबसे प्रचलित कथा प्रह्लाद, होलिका और हिरण्यकश्यप की है लेकिन इसके अलावा एक और कथा भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी। श्री राम के एक पूर्वज रघु, के राज में एक असुर नारी थी। वह नगरवासियों पर तरह-तरह के अत्याचार करती। उसे कोई मार भी नहीं सकता था, क्योंकि उसने वरदान का कवच पहन रखा था।
उसे सिर्फ बच्चों से डर लगता था। एक दिन गुरु वशिष्ठ ने उस राक्षसी को मारने का उपाय बताया। उन्होंने कहा कि अगर बच्चे नगर के बाहर लकड़ी और घास के ढेर में आग लगाकर उसके चारों ओर नृत्य करें, तो उसकी मौत हो जाएगी। फिर ऐसा ही किया गया और राक्षसी की मौत के बाद उस दिन को उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा।

