तिल्दा नेवरा-सिंधी समाज के द्वारा रविवार को कुटुंब प्रबोधन का संदेश देते हुए बड़े धूमधाम से थदड़ी पर्व मनाया।किसी भी धर्म के त्योहार और संस्कृति उसकी पहचान होते हैं। त्योहार उत्साह, उमंग और खुशियों का ही स्वरूप हैं। लगभग सभी धर्मों के कुछ विशेष त्योहार होते हैं, जिन्हें उस धर्म से संबंधित समुदाय के लोग मनाते हैं। ऐसा ही पर्व है सिंधी समाज का थदड़ी पर्व। थदड़ी शब्द का सिंधी भाषा में अर्थ होता है ठंडा, शीतलता प्रदान करना। रक्षाबंधन के आठवें दिन से इस पर्व को समुचा सिंधी समुदाय थदड़ी पर्व मनाता है। सिंधी समाज ने घरों में चूल्हा नहीं जलाया,और शनिवार की शाम को बनाया गया ठंडा भोजन ग्रहण किया.

सिंधी समाज के द्वारा यह पर्व रक्षाबंधन के आठवें दिन मनाया जाता है थधड़ी के दिन घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता है,और एक दिन पूर्व बनाया गया ठंडा भोजन ग्रहण किया जाता है.रविवार की सुबह महिलाओं ने शनिवार को बनाए गए भोजन और व्यंजन को दरियाशाह यानी कि जल देवता को अर्पण कर तालाब और नदियों में डुबकियां लगाई, वहां का शुद्ध जल लाकर घरों में छिड़काव किया और पूजा अर्चना कर परिवार के साथ ठंडा भोजन ग्रहण किया,

मीना तालरिया ने बताया की थधड़ी शब्द का सिंधी भाषा में अर्थ शीतल होता है.रक्षाबंधन के आठवें दिन इस पर्व को समूचा सिंधी समुदाय हर्षोल्लास से मानता है. हजारों वर्ष पूर्व में सिंध के मोहन जोदडो की खुदाई में मां शीतला देवी की प्रतिमा निकली थी. ऐसी मान्यता है कि उन्ही की आराधना में आज तक थधडी का पर्व हर साल मनाया जाता है. उन्होंने बताया कि इस त्यौहार के एक दिन पहले हर सिंधी परिवार में तरह-तरह के व्यंजन बनता हैं’और दूसरे दिन सर्वप्रथम परिवार के सभी सदस्य जल स्रोत के पास इकट्ठे होकर मां शीतला की विधिवत पूजा करते हैं जिसमें घर के छोटे बच्चों को विशेष रूप से शामिल किया जाता है. उनके लिए प्रार्थना की जाती है कि वह शीतल रहे वह माता के प्रकोप से बचे रहे, इस दौरान यह पंक्तियां गई जाती है कि ठार माता ठार पहिंजे बचडन के ठार. माता अगे भी ठारियो थइ हाडे भी ठार.. तत्पश्चात पूरा दिन घरों में चूल्हा नहीं जलता है,

