Saturday, February 21, 2026
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हलषष्ठी:संतान की लंबी उम्र के लिए महिलाओं ने रखा व्रत

तिल्दा नेवरा शहर सहित ग्रामीण अंचल में शनिवार को कमरछठ (हलषष्ठी व्रत) की पूजा की गई। शहर के वार्ड 17 शिक्षक कॉलोनी मैं बजरंगबली मंदिर के सामने और शिव मंदिर के पास. वार्ड 12 सरस्वती शिशु मंदिर के सामने सासाहोली, तिल्दा बस्ती, सहित गांवो में भी  अनेक जगहों पर महिलाओं ने पूजा की। इसके अलावा मंदिरों में भी महिलाएं पूजा करने के लिए पहुंची थीं। शहर में जगह-जगह पारा मोहल्ले में धूमधाम से पर्व मनाया गया और पूजा व शिव-पार्वती की पूजा अर्चना की। महिलाओं हलषष्ठी माता से अपनी संतान की लंबी उम्र के लिए कामना की।

पूजन के लिए आंगन में दो गड्ढा खोदा जाता है जिसे सगरी कहा जाता है। महिलाएं अपने-अपने घरों से मिट्टी के खिलौने, बैल, शिवलिंग, गौरी- गणेश इत्यादि बनाकर लाती हैं। जिन्हें उस सगरी के किनारे पूजा के लिए रखा गया। उस सगरी में बेल पत्र, भैंस का दूध, दही, घी, फूल, कांसी के फूल, सिंगार का सामान, लाई और महुए का फूल गया। महिलाएं एक साथ बैठकर हलषष्ठी माई के व्रत की कथाएं सुनी।

उसके बाद शिवजी की आरती व हलषष्ठी देवी की आरती के साथ पूजन समाप्त किया। माताएं नए कपड़े का टुकड़ा सगरी के जल में डुबाकर घर ले जाती हैं और बच्चों के कमर पर से छह बार स्पर्श करती हैं, इसे पोती मारना कहते हैं।

भैंस के दूध का किया उपयोग
महिलाओं ने बताया कि इस दिन भैंस के दूध का उपयोग पूजा पाठ में किया जाता है। महिलाओं का किसी भी ऐसे स्थान पर जाना वर्जित होता है जहां हल से काम किया जाता हो, यानि खेत, फॉर्म हाउस, यहां तक की अगर घर के बगीचे में भी यदि हल का उपयोग होता है तो वहां भी नहीं जाते हैं। फलाहार में पसहर का चावल खाया जाता है।

इसके अलावा छह प्रकार की भाजियों का उपयोग किया जाता है, भैंस के घी का प्रयोग छौंकने के लिए किया जा सकता है। इस भोजन को पहले छह प्रकार के जानवरों के लिए जैसे कुत्ते, पक्षी, बिल्ली, गाय, भैंस और चींटियों के लिए दही के साथ पत्तों में परोसा जाता है। फिर व्रत करने वाली महिलाएं सूर्यास्त से पहले फलाहार करती हैं।

जन्माष्टमी से पहले मनाया जाता है हलछठ
हलषष्ठी पूजन कथा के विषय मे दुर्गेश वैष्णव, सुमन गोस्वामी ने बताया कि मान्यतानुसार इस तिथि पर भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म हुआ था। हल को वे अस्त्र के रूप में कंधे पर धारण करते थे, इसलिए व्रत पारणा में भी हल से उपजे अन्न का उपयोग नहीं किया जाता। माताएं अपने पुत्रों के दीर्घायु के लिए इस व्रत को करती हैं। द्वापर युग में माता देवकी के 6 पुत्रों को जब उसके भाई कंस के आदेश पर मार दिया गया तब देवर्षि नारदजी की प्रेरणा से माता देवकी ने छठ माता का व्रत रखा जिससे उनके संतान की रक्षा हुई।

पूजन सामग्री की हुई खरीदारी: शुक्रवार और शनिवार की सुबह भी महिलाओं ने खरीदारी की। कोरोना वायरस का असर पूजा सामग्री की खरीदारी पर नहीं दिखाई दिया। शहर के संजय बाजार में तो इस दौरान बार-बार लगने वाले जाम के चलते परेशानी उठानी पड़ी। सड़क किनारे कासा सहित पूजा सामग्री की दुकानों में खरीदारी की।

तिल्दा ब्लाक के ग्राम छतौद ने हलषष्ठी  पूर्ण श्रधा के साथ मनाइ गई,संतान की दीर्घायु और खुशियों की कामना के लिए महिलाएं हर साल हलषष्ठी का व्रत रखती हैं। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से संतान को सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है। बलराम जी का मुख्य शस्त्र हल और मूसल है इसलिए उन्हें हलधर भी कहा जाता है एवं उन्हीं के नाम पर इस पावन पर्व का नाम हल षष्ठी पड़ा है। हलषष्ठी के दिन माताओं को महुआ की दातुन और महुआ खाने का विधान है।

छतौद के गणेश चाैक में पूजा कार्यक्रम का विधि विधान से महाराज टी पी शर्मा ने सपन्न कराया,कथामें बताया की  एक ग्वालिन दूध दही बेचकर अपना जीवन व्यतीत करती थी। एक बार वह गर्भवती दूध बेचने जा रही थी तभी रास्ते में उसे प्रसव पीड़ा होने लगी। इस पर वह एक झरबेरी पेड़ के नीचे बैठ गई और वहीं पर एक पुत्र को जन्म दिया। ग्वालिन को दूध खराब होने की चिंता थी इसलिए वह अपने पुत्र को पेड़ के नीचे सुलाकर पास के गांव में दूध बेचने के लिए चली गई। उस दिन हलछठ का व्रत था और सभी को भैंस का दूध चाहिए था लेकिन ग्वालिन ने लोभवश गाय के दूध को भैंस का बताकर सबको दूध बेच दिया। इससे छठ माता को क्रोध आया और उन्होंने उसके बेटे के प्राण हर लिए। ग्वालिन जब लौटकर आई तो रोने लगी और अपनी गलती का अहसास किया। इसके बाद सभी के सामने उसने अपना गलती स्वीकार कर पैर पकड़कर माफी मांगी। इसके बाद हर छठ माता प्रसन्न हो गई और उसके पुत्र को जीवित कर दिया। इस वजह से ही इस दिन पुत्र की लंबी उम्र की कामना से हलछठ का व्रत व पूजन किया जाता है।

कथा पूजन में व्रतधारी मताए  अमृत सुमन राजपूत,सुलोचना साहू,हेमिनसाहू, सुभद्रा साहू,कुसुम वर्मा,सूरज साहू,रेणु वर्मा, दुर्गेस्वरी वर्मा,मधु वर्मा,पूनम साहू,लता साहू,लक्ष्मी साहू,अर्चना साहू, धनेश्वरी, नीरा ,खुशबू, मंजू, केशर साहू
सहित बड़ी संख्या में महिलाए शामिल हुई,

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