इंदर कोटवानी
रायपुर के नकटी गांव में हुई बुलडोजर कार्रवाई अब केवल अतिक्रमण हटाने की प्रशासनिक कार्रवाई भर नहीं रह गई है…। यह मामला धीरे-धीरे सरकार, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच समन्वय, जवाबदेही और राजनीतिक संदेश का विषय बनता जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर विरोध, जनप्रतिनिधियों की पहल और संवाद की मांग के बावजूद बुलडोजर क्यों चला.? यदि स्थानीय सांसद और वरिष्ठ भाजपा नेता बृजमोहन अग्रवाल स्वयं ग्रामीणों के पक्ष में बातचीत की बात कर रहे थे, तो क्या प्रशासन ने उनकी बात को पर्याप्त महत्व नहीं दिया.? यदि ऐसा हुआ, तो यह स्वाभाविक है कि राजनीतिक गलियारों में अफसरशाही की भूमिका पर सवाल उठें.।
बृजमोहन अग्रवाल का रुख इस पूरे घटनाक्रम में अलग दिखाई देता है,। पिछले वर्ष भी जब नकटी गांव के लोगों को बेदखली का नोटिस मिला था, तब उन्होंने खुलकर ग्रामीणों का पक्ष लिया था और आश्वासन दिया था कि अन्याय नहीं होने दिया जाएगा,। उस समय मामला कुछ समय के लिए शांत भी हो गया था। लेकिन इस बार दोबारा नोटिस जारी हुआ और उनके अनुसार बातचीत के बावजूद अगले ही दिन बुलडोजर चल गया.।
बृजमोहन अग्रवाल ने सार्वजनिक रूप से सरकार पर नहीं, बल्कि अधिकारियों पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि बातचीत के बाद भी कार्रवाई हुई है तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए और इस विषय को वे पार्टी मंच पर भी उठाएंगे। उनके इस बयान ने राजनीतिक चर्चा को और तेज कर दिया है।..
वहीं दूसरी ओर भाजपा के अधिकांश बड़े नेता इस मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से मुखर नहीं दिखे। कुछ नेताओं ने चुप्पी साध रखी, जबकि कुछ ने प्रशासनिक कार्रवाई को उचित बताया। इससे यह धारणा भी बन रही है कि पार्टी के भीतर इस मुद्दे को लेकर अलग-अलग सोच मौजूद है। हालांकि इन राजनीतिक आकलनों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की जा सकती।
सबसे अधिक प्रभावित वे ग्रामीण हैं, जिनके मकान टूट चुके हैं। सरकार की ओर से वैकल्पिक आवास उपलब्ध करा दिया है और भी बात कही गई है, लेकिन अनेक ग्रामीण वहां जाने को तैयार नहीं हैं.। उनका कहना है कि केवल मकान देना पर्याप्त नहीं, बल्कि उनके वर्षों पुराने सामाजिक और आर्थिक जीवन को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। यही कारण है कि वे लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं—कभी कलेक्ट्रेट का घेराव, कभी जनप्रतिनिधियों के आवास पर प्रदर्शन और कभी मुख्यमंत्री निवास तक अपनी आवाज पहुंचाने की कोशिश।
.राजनीतिक दृष्टि से देखें तो इस पूरे घटनाक्रम ने विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस, को सरकार पर हमला बोलने का अवसर दिया है. सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और तस्वीरों ने भी इस मामले को व्यापक चर्चा का विषय बना दिया है…। ऐसे दृश्य जनमत को प्रभावित करते हैं और सरकार की छवि पर असर डाल सकते हैं.।
हालांकि यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि यदि भूमि सरकारी अभिलेखों में सार्वजनिक उपयोग के लिए अधिग्रहित या आवंटित थी और कार्रवाई न्यायालय अथवा विधिक प्रक्रिया के अनुरूप की गई है, तो प्रशासन अपने अधिकार क्षेत्र में कार्रवाई करने का दावा कर सकता है। इसलिए इस पूरे विवाद का एक कानूनी पक्ष भी है, जिसे नजर अंदाज नहीं किया जा सकता।
अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न भविष्य का है। क्या सरकार इस विवाद को केवल प्रशासनिक कार्रवाई मानकर आगे बढ़ेगी, या फिर प्रभावित परिवारों से संवाद स्थापित कर भरोसा बहाल करने का प्रयास करेगी? क्या संबंधित अधिकारियों की भूमिका की समीक्षा होगी? और क्या जनप्रतिनिधियों की आपत्तियों को गंभीरता से लिया जाएगा?
नकटी का यह विवाद केवल एक गांव तक सीमित नहीं है। यह शासन व्यवस्था में संवाद, संवेदनशीलता और प्रशासनिक जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है। आने वाले दिनों में सरकार और प्रशासन इस मामले को किस तरह संभालते हैं, उसी से तय होगा कि यह प्रकरण केवल एक स्थानीय विवाद बनकर रह जाता है या फिर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय तक चर्चा का विषय बना हेगा .

