Sunday, January 25, 2026
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धूमधाम से मनाया गया छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा का पर्व, ‘छेरछेरा’ घर-घर माँगा गया अन्न दान

तिल्दा नेवरा-छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति और सामूहिक जीवन दर्शन का प्रतीक छेरछेरा पर्व शनिवार पौष पूर्णिमा के पावन अवसर पर तिल्दा शहर सहित पास के सभी गावों में हर्षोल्लास के साथ बड़े उत्साह से मनाया गया.कड़ाके की ठंड के बावजूद छोटे-छोटे बच्चों किशोर और युवाओं की टोलियां सुबह से ही गांव और मोहल्ले में छेरछेरा का दान मांगने निकल पड़ी थी. इस मौके पर ढोलक मंदार और पारंपरिक गीतों के साथ डंडा नृत्य की चमक ने पूरे क्षेत्र को लोक संस्कृति के रंग में रंग दिया.सुबह से दोपहर तक छेरछेरा माई कोठी के धान ल हेरते हेरा की गूंज  मोहल्लो  में सुनाई देती रही .घर-घर पहुंची टोलियो का लोगों ने खुले दिल से स्वागत किया और मुट्ठी भर भर कर धान का दान दिया. इस दौरान  छेरछेरा पर्व की रौनक देखते ही बनती थी

छेरछेरा पर्व का मूल भाव है -सबका पेट भर कोई भूखा ना रहे. फसल कटाई के बाद जब घर-घर अन्न की भरपूरता होती है तब समाज के सभी वर्गों के साथ उसे बांटने की भावना सेइस पर्व को मनाया जाता है.लोक विश्वास है की पौष  पूर्णिमा के दिन किया गया दान कई गुना पुण्य फल देता है, इसीलिए इस दिन अन्नदान को विशेष महत्व दिया गया है।

लोक मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में छत्तीसगढ़ अंचल में जब काल और अभाव की स्थिति बनी तब समाज के लोगों ने तय किया कि जिनके पास अधिक अन्न है वह जरूरतमंदों को देंगे. इसी परंपरा से समय के साथ छेरछेरा का रूप ले लिया .

‘छेरछेरा माई कोठी के धान ल हेर हेरा’ जैसे लोकगीतों के माध्यम से लोग अन्न  मांगते हैं. जो किसी भी प्रकार की भिक्षा नहीं बल्कि सम्मान जनक सामाजिक सहभागिता मानी जाती है ,शनिवार के दिन गांव गांव शहर मोहल्ले में बच्ची, युवा और लोक कलाकार टोली बनाकर घर-घर पहुंचे .कई लोग लोकगीत गाते चावल, दान, गेहूं ,सब्जी या सामर्थ्य अनुसार दान स्वीकार किया .कई स्थानों पर पारंपरिक वेशभूषा मांडर नगाड़ा और लोक नृत्य के वातावरण को भी जीवंत बना दिया.

छेरछेरा को लेकर घरो में खासकर महिलाओ ने पहले से ही चावल .धान और अन्य दान की जाने वाली सामग्री तैयार कर रखी थी. सुबह होते ही घर-घर जाकर बच्चों और युवाओं की टोलियां ने लोकगीतों के साथ छेरछेरा किया.छेरछेरा बोलते बच्चो की आवाज सुनकर घरो से बाहर आकर सुपा में रखे धान चावल को मुठा से भर-भरकर दोनों हाथो से दिल खोलकर  दान किया , कई लोगो ने खासकर शहरी इलाके में .छेरछेरा मांगने आए बच्चो को चाकलेट और बिस्कुट दिए .कुछ स्थनों और मंदिरों में सामूहिक भोज और भंडारे आयोजित किए गए. जरूरतमंदों वृद्ध और असहायो को अन्य वस्त्र का वितरण किया गया .चावल नगरी तिल्दा से जुड़े ग्राम तुलसी, कोटा, कोहका जोता . सिनोधा . टंडवा बिलाडी तिल्दा  बस्ती.ससा होली सहित पुरे क्षेत्र में धूम रही..

छेरछेरा पर्व आज भी यह संदेश देता है कि समाज तभी समृद्ध होता है .जब संपन्नता का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे. दान दिखावा नहीं बल्कि कर्तव्य है. लोक परंपराएं हमारी सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक एकता की रीड है.छेरछेरा केवल एक पर्व नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ की आत्मा है ,पौष पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह उत्सव आज भी हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है और सीखना है की साझा खुशहाली  ही सच्ची समृद्धि है, आज छत्तीसगढ़ में एक बार फिर अपनी लोक परंपरा के माध्यम से यह सिद्ध कर दिया कि यहां की संस्कृति मानवीय मूल्यों और सामूहिक तौर पर आधारित है

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