क्यों नक्सली बन रहे हैं बस्तर के आदिवासी

वीसीएन टाइम्स
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सत्य समीक्षा
मनोज अग्रवाल भिलाई

भिलाई।..इन दिनों बीजापुर के पत्रकार मुकेश चंद्राकर की हत्या का मामला काफी गर्माया हुआ है। हत्या की वजह सड़क निर्माण में भ्रष्टाचार को लेकर खबर उजागर करने के कारण माना जा रहा है। दक्षिण बस्तर के बड़े हिस्से में नक्सली गतिविधियां लंबे समय से चली आ रही है दक्षिण बस्तर में बीजापुर, भोपालपटनम, गीदम, दंतेवाड़ा, सुकमा और कोंटा में शुरुआती दिनों में आंध्र प्रदेश के नक्सली काफी सकरी रहते थे। धीरे-धीरे दक्षिण बस्तर के स्थानीय निवासियों को आंध्र प्रदेश के नक्सली उनके ब्रेन वास करके नक्सली गतिविधियों में शामिल करते गए आज ऐसी स्थिति है की आंध्र प्रदेश के नक्सली दक्षिण बस्तर में नहीं के बराबर दिखाई देते हैं जबकि स्थानीय आदिवासी नक्सली बन चुके हैं तथा हिंसक गतिविधियों में शामिल होने के कारण लगातार सुरक्षा बलों के निशाने पर रहते हैं। स्थानीय वेशभूषा में इन नक्सलियों को पहचाना बहुत मुश्किल होता है केवल स्थानीय अन्य ग्रामीण आदिवासी ही पहचान पाते हैं इसीलिए कभी-कभी सुरक्षा बलों पर यहां आप भी लगाया जाता है कि वह निर्दोष ग्रामीण आदिवासियों की हत्या कर रहे हैं यदि कोई स्थानीय ग्रामीण आदिवासी इसकी जानकारी पुलिस को देते हैं तो नक्सली उन्हें पुलिस का मुखबीर होने के नाम पर बड़ी बेरहमी से मार डालते हैं।
बात मैं पत्रकार मुकेश चंद्राकर की हत्या के बारे में कहना चाह रहा हूं। अभिभाजित मध्य प्रदेश के समय बस्तर का मुख्यमंत्री इसके प्रभारी हुआ करते थे, बस्तर के विकास की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री की हुआ करती थी बस्तर के विकास के नाम पर बड़ी धनराशि आवंटित होती रही है , हर तरह के निर्माण के लिए काफी पैसा आता रहा है और यही कारण है कि स्थानीय ठेकेदार बस्तर क्षेत्र के कामों को लेते रहे हैं, पर इनके निर्माण की जांच सही तरीके से नहीं होने के कारण इन निर्माण कार्यों में बड़ी मात्रा में भ्रष्टाचार होता रहा है। भ्रष्टाचार करने वाले नक्सलियों की आड़ में जमकर भ्रष्टाचार करते रहे हैं और आज भी करते आ रहे हैं। ईमानदारी से बस्तर के विकास कार्यों की समीक्षा की जाए तो पता चलेगा कि स्थल पर निर्माण कार्य नहीं के बराबर हुआ है जबकि कागज में पूर्णता दिखाकर या नक्सली विरोध दिखाकर राशि सब मिल बाटकर खा जाते रहे हैं इनमें संबंधित विभाग के अधिकारियों के अलावा जनप्रतिनिधि भी पाक साफ नहीं है। नक्सलियों को भी हिस्सा पहुंचता रहा है। बस्तर के भाजपा और कांग्रेस के विधायक भी इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि बस्तर में विकास करना तभी संभव है जब नक्सली सहमति होती है। हालांकि पहले की तुलना में नर्सरी गतिविधियां काफी नियंत्रित एवं सीमित हो गई है दुख सिर्फ इतना है कि स्थानीय आदिवासी नक्सली क्यों बन रहे हैं? इस पर गहन विचार विमर्श करना जरूरी है। पत्रकार
मुकेश चंद्राकर और उनके हत्या के आरोपी का पारिवारिक परिचय है और यही कारण है कि मुकेश चंद्राकर को सड़क निर्माण में हो रहे भ्रष्टाचार की जानकारी मिल जाती थी , जिसका उजागर उन्होंने किया और इसका दुष्परिणाम भी भुगतना पड़ा। बस्तर क्षेत्र में एक भी निर्माण कार्य ऐसा नहीं होगा जिस पर भ्रष्टाचार ना किया जाता है।
मुकेश चंद्राकर की हत्या के बाद ट्रक शायद कोई पत्रकार होगा जो घटिया निर्माण कार्य एवं भ्रष्टाचार को उजागर करने की हिम्मत जुटा पाए। राज्य सरकार बस्तर में चल रहे सभी निर्माण कार्यों की समीक्षा करवा जांच करवाई तो भ्रष्टाचार का पहाड़ दिखाई देने लगेगा। मैंने 1988 में देशबंधु के जिला प्रतिनिधि होने के नाते बस्तर के इन सभी क्षेत्र का दौरा किया है और हर जगह मुझे एक ही जानकारी मिलती थी कि नक्सली निर्माण कार्य नहीं होने देते हैं या उनकी सहमति के बगैर निर्माण कार्य करना संभव नहीं है उन्हें विश्वास में लेना पड़ता है और इसी की आड़ में खुलकर भ्रष्टाचार होता है। जंगल की कटाई और काम करने के लिए भी वन अधिकारी , बन ठेकेदार , ट्रांसपोर्टर इन सबको एक बड़ी रकम नक्सलियों को देनी पड़ती है और वे लोग इसी की आड़ में खुद की कमाई भी करते रहते हैं । वहां का हर निवासी इस बात से अच्छी तरह से परिचित है और जनता भी है। राज्य सरकार हो या केंद्र सरकार बस्तर जैसे इलाकों में पूरी ईमानदारी दिखाएंगे तभी पत्रकारों की हत्या नहीं होगी। भाजपा और कांग्रेस सहित अन्य राजनीतिक दल के प्रतिनिधि समय-स HVमय पर एक दूसरे पर आरोप लगाते रहते हैं.

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