खबर प्रकाशित होने के बाद हरकत में आई नगर पालिका, डामर की जगह ईंट-पत्थर और मुरम से भरे गड्ढे, लोगों ने कहा- पहली बारिश में फिर खुल जाएगी पोल
तिल्दा-नेवरा-नगर पालिका तिल्दा-नेवरा एक बार फिर सवालों के घेरे में है। शहर की जर्जर सड़कों को लेकर समाचार प्रकाशित होने के बाद पालिका प्रशासन ने गड्ढों की स्थायी मरम्मत कराने के बजाय उन पर ईंट, पत्थर, मुरम और निर्माण मलबा डालकर खानापूर्ति शुरू कर दी है। इस कार्रवाई की शहरभर में चर्चा है और लोग इसे “भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने की कोशिश” बता रहे हैं।
शहरवासियों का कहना है कि पहले सीमेंट सड़क बनाई गई, उसके ऊपर डामर की परत चढ़ाई गई और अब जब पहली ही बारिश में डामर उखड़ गया तो गड्ढों को मलबे से भर दिया गया। लोगों का सवाल है कि क्या यही नगर पालिका की सड़क मरम्मत की नई तकनीक है?

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि पिछले तीन-चार दिनों से बारिश रुकी हुई है, इसलिए फिलहाल मलबा गड्ढों में दिखाई दे रहा है। लेकिन जैसे ही बारिश शुरू होगी, यही मुरम और मिट्टी कीचड़ में बदल जाएगी, गड्ढे फिर से सामने आ जाएंगे और लोगों की परेशानी जस की तस बनी रहेगी। इसके बावजूद सड़क मरम्मत के नाम पर सरकारी राशि खर्च होने का दावा कर दिया जाएगा।
सबसे बड़ा सवाल इस सड़क की गुणवत्ता पर भी उठ रहा है। जिस सड़क पर आज गड्ढों की भरमार है, उसका निर्माण महज आठ से नौ महीने पहले किया गया था। पहली ही बारिश में डामर उखड़ गया, कई जगह गिट्टी बाहर आ गई और सड़क की गुणवत्ता पर सवाल खड़े हो गए। अब स्थायी मरम्मत की जगह मलबा डालकर काम चलाया जा रहा है।
शहरवासियों का कहना है कि सड़क को सुंदर बनाने का दावा करने वाली नगर पालिका अब खुद सड़कों पर निर्माण मलबा डालकर शहर की सुंदरता बिगाड़ रही है। कई स्थानों पर लोगों ने अपनी जेब से सीमेंट, गिट्टी और रेत खरीदकर घरों और दुकानों के सामने सड़क की मरम्मत कराई, लेकिन पानी निकासी की व्यवस्था नहीं होने से वहां भी दोबारा गड्ढे बन गए।
कांग्रेस पार्षद किरण बाला ने कहा कि नगर पालिका को खानापूर्ति छोड़कर सड़क की तकनीकी और स्थायी मरम्मत करानी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि जब तक जल निकासी की व्यवस्था नहीं सुधरेगी, तब तक सड़कें बार-बार टूटती रहेंगी और जनता को परेशानी झेलनी पड़ेगी।
सवाल-क्या 8–9 महीने में सड़क उखड़ना निर्माण गुणवत्ता पर सवाल नहीं उठाता?गड्ढों में डामर की जगह मलबा भरना क्या स्थायी समाधान है?सड़क मरम्मत के नाम पर आखिर कितना खर्च हुआ और उसका हिसाब कौन देगा?

