तिल्दा नेवरा- ये कहावत है जब बैल गाड़ी खींच रहा होता है और उसके नीचे कुत्ता साथ-साथ चलता है, तो कुत्ते को यह गलतफहमी हो जाती है कि गाड़ी वो चला रहा है। ठीक उसी प्रकार की बातें तिल्दा नेवरा सिंधी पंचायत मैं चरितार्थ हो रही है। 18 सितंबर को 3 साल पहले सिंधी पंचायत में अध्यक्ष पद का चुनाव हुआ था। चुनाव 2 वर्षों के लिएकराया गया था। लेकिन नए अध्यक्ष ने शपथ लेने के बाद उसने नई बॉडी का गठन किया और अपने साथ ऐसे दरबारियों को शामिल किया जिनमें ज्यादातर लोगों को समाज स्वीकार नहीं करती है,ऐसे लोग समाज सेवा के आड़ में पंचायत के सदस्य बनकर अपनी दुकानदारी चलाते हैं।
अध्यक्ष के द्वारा 1 वर्ष के कार्यकाल को बढ़ाए जाने के बाद किसी ने विरोध नहीं किया.नियमानुसार 18 सितंबर के पहले अध्यक्ष को स्वयं स्तीफा देकर पंचायत की कमेटी को भंग कर दिया जाना था,लेकिन अध्यक्ष के द्वारा ऐसा नहीं किया गया। दरअसल वह समझते हैं कि बगैर मेरे समाज अधूरा है। लेकिन उन्हें यह जानकारी नही की जो मैंने पहले बैलगाड़ी का किस्सा बताया है।सिंधी समाज के अध्यक्ष श्रीछमन लाल जी भी उसी मुगालते में है कि वे ही पंचायत की गाड़ी को खींच रहे हैं।हलाकि यह मुहावरा अक्सर भ्रम और घमंड समझाने के लिए बोला जाता है।
आज से 40 साल पहले सिंधी पंचायत में इसी तरह का तानाशाही रवैया अपनायाजाता था. और एक समय ऐसा आया तब समाज दो गुटों में तब्दील हो गया.और नौबत ऐसी आई की पंचायत की गेट में ताले लगा दिए गए। मामला कोर्ट तक गया। उस समय पंचायत कमेटी में वर्तमान अध्यक्ष भी शामिल थे। लेकिन रायपुर के एक कांग्रेसी नेता दाढ़ी वाले का इतना वर्चस्व था..किजब सिंधी समाज का दूसरा गुट पंचायत को अपनी जागीर समझने वालो का विरोध करने सामने आता तो उसे दबा दिया जाता फिर वे चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते थे । हालात इतने खराब हुए की पंचायत मैं शुरू हुए 7 दिवसीय अखंड पाठ साहब इसी अध्यक्ष तत्कालीन पदाधिकारी के चलते और उस दाढ़ी वाले के वरदहस्त के कारण अखंड पाठ साहब पूर्ण होने के पहले ही विसर्जित कर दिया गया. हलाकि जिन समाज के लगो ने गुरु ग्रन्थ साहब की सवारी को बिना पथ पूरा हुए उठाया,उसका दुषपरिणाम सामने आया..और उनके परिजनों को नुकसान भी उठाना पड़ा। दो गुटों में बटा समाजबड़ी मुश्किल से एकजुट हो सका है। अब वही परिस्थितियां बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
3 साल के कार्यकाल में एक बार भी सार्वजनिक बैठक बुलाकर समाज के लोगो बीचआने की हिम्मत अध्यक्ष और उनके सदस्य नही जूटा पाए..बेशर्मी की हद तो तब हो गई जब रविवार 7 सितंबर को अपने द्वारा गठित की गई कमेटी के सदस्यों को बुलाकर तीन महीने के कार्यकाल को बढ़ा दिया गया। मजेदार बात यह है कि इस कार्यकाल को बढ़ाने पहले ही स्क्रिप्ट तैयार कर ली गई थी।उसी आदहर पर अध्यक्ष ने बैठक में अपनी बात को रखा और कहा कि नए सिंधी पंचायत भवन के लिए जमीन का मामला कोर्ट में विचाराधीन है, उसके निर्णय तक मेरे कार्यकाल को बढ़ाया जाए। और बाकी सभी दरबारी हां में हां मिलाकर तालियां बजा देते हैं और 3 महीने का कार्यकाल बढ़ जाता है। जिस प्रकार सर्कस में शेर झुक जाता है और बंदर भी मंत्री बन जाता है। उसी प्रकार पंचायत के कुछ सदस्य सर्कस में शेर की तरह झुक गए… दर असल तिल्दा की पंचायत ऐसी मिठाई है जिसे खाने के लिए ऐसे चाटुकार पद में बने रहने डायबिटीज भुल जाते हैं।
जबकि जिस सदस्य के कहने पर कार्यकाल बढ़ाया गया है उसकी औकात शहर में एक टके की नहीं है। पहले वे सेंट्रल सिंधी पंचायत में शामिल थे वह से धकिया दिए तो अब अपनी सामाजिक राजनीती कायम रखने अब तिल्दा पंचायत में रहकर राजनीति करने नया षड्यंत्र रच रहे है।
जबकि पत्रकार इन्दरतरकर का नही सिन्धी समाज के इन्दर कोटवानी का दावा है अध्यक्ष महोदय के कार्यकाल के बढ़ाने की बात करने वाले नेता में अगर हिमत है तो अध्यक्ष पद लड़ने की बात तो दूर अपने वार्ड से पंचायत सदस्य का चुनाव जित कर बता दे ..इंदर अपनी कलम को उनके चरणों में रख देगा…और यदि समाज को तोड़ने की सोचते होगे तो शायद इस बात को भूल रहे हैं कि 40 साल पहले की जो परिस्थितियों थी. अब वैसी परिस्थितियों समाज में नहीं है। अब समाज का युवा जागा हैं.. जरूरत पड़ने पर युवा समाज की भलाई और हक़ के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार बैठे है।
यहां के युवाओ की धमनी में समाज में कुछ कर गुजरने वाला खून दौड़ता है,ऐसे भी चुनाव जीतकर आए लोगों के मुंह पर युवा कालिक पोतने से नहीं डरे हैं। यह बात वर्तमान समाज का अध्यक्ष भी जनता है ,क्यों की वे भी समाज के युवा के गुस्से को देख चुके है.परिस्थितियों तब बिगडती है, जब पद पर आसीन व्यक्ति या कहा जाए राजा का आंतक बढ़ता है और वह मनमानी कर आंतक फलने की कोशिश करने लगता है तब मौन प्रजा अचानक आक्रोशित हो जाती है। और जब ऐसी परिस्थितियों सामने आती है। तो प्रजा को संभालना मुश्किल हो जाता है।
सिंधी समाज पर भगवान झूलेलाल का आशीर्वाद है यह समाज मांगने वाली कोम नहीं बल्कि देने वाली समाज है। जिस व्यक्ति ने समाज को जमीन दिलाने की बात कही उन्होंने ऐसी जमीन दिला दी जिस पर पहले से ही किसी और ने हक जमा रखा था। आज उस जमीन के लिए समाज को कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। पर शायद मुखिया को यह जानकारी नहीं है कि यहां से यदि मामले मेंकोर्ट उनके पश में फैसला देता है तो भी समाज को जमीन इसलिए नहीं मिल पाएगी क्यों कि सामने वाली पार्टी इस मामले को सेशन कोर्ट में ले जाकर अपील करेंगे फिर नए सिरे से तारीख पर तारीख मिलेगी । सिंधी पंचायत में क्या हो रहा है यह किसी से छुपा नहीं है।लेकिन यह तय है कि यहां जो गड़बड़ियां हुई है उसका खामियांजा पहले सिंधी पंचायत के अध्यक्ष को भुगतना पड़ेगा।और जब आदमी के बुरे दिन आते हैं तो ऊंट पर बैठे व्यक्ति को भी कुत्ता काट देता है।
अध्यक्ष महोदय यह बात स्पष्ट जान ले जनता ने आपको 2 साल चुन कर भेजा था। यदि कार्यकाल बढ़ाना है तो आप तत्काल एक सार्वजनिक बैठक बुलाए, जिस प्रकार आपने हर छोटे बड़े समाज की व्यक्ति के सामने झोली फैलाकर हाथ जोड़कर,एक बार समाज की सेवा करने के लिए का मौका मांगा था, समाज के मतदाताओ ने अपना मत आपकी झोली डाला ठीक उसी प्रकार 3 महीने के कार्यकाल को बढ़ाने के लिए, आपको जनता के बीच जाना होगा ..यह दरबारी आपके बनाए हुए हैं जनता ने इन्हें नहीं चुना है। माफ करना अध्यक्ष महोदय में अन्याय का विरोधी हूं। व्यक्ति का नहीं। मैं सिंधी हूं, मेरे लिए भारत माता की भूमि और इस छत्तीसगढ़ की धरती सर्वमान्य है। उतनी ही मेरे लिए सिंधियत.. सर्वोपरि है..गलत होगा वरोध करुगा ,,जय सिन्धी
इंद्र कोटवानी की कलम से

