कांकेर -छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण को लेकर आदिवासी ग्रामीण भी मुखर होकर विरोध करने लगे है..आदिवासियों न्र धर्मांतरण के विरोध में गावो में बैनर लगाए हैं।रूका नहीं है, छग हाईकोर्ट ने भी साफ ख दिया है की जबरन धर्मांतरण रोकने के लिए लगाए गए बोर्ड असंवैधानिक नहीं है .छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण रूका नहीं है,धड़ल्ले से हुआ है और हो रहा है ..
2 दिन पहले कांकेर के कोड़ेकुर्सी थाना क्षेत्र में एक धर्मांतरित व्यक्ति का शव को दफनाने को लेकर दो समुदाय आमने-सामने आ गए। विवाद इतना बढ़ा कि परिवार शव को लेकर लोग थाने पहुंच गया। प्रशासन को शव कहीं और दफनाने का निर्णय लेना पड़ा। विवाद इतने पर भी नहीं थमा, शव को शनिवार को धमतरी में दफनाने की आशंका में हिंदू जागरण मंच ने विरोध का झंड़ा उठा लिया।
राजधानी रायपुर की जहां प्रदेशभर के 242 परिवारों के लगभग 700 लोगों ने हिंदू धर्म में वापसी की। जिसकी अगुआई की भाजपा नेता और धर्मांतरण के खिलाफ अभियान चलाने वाले प्रबल प्रताप सिंह जूदेव ने जगद्गुरु रामानंदाचार्य और स्वामी नरेंद्रचार्य के समक्ष धर्मांतरित लोगों के पैर धोकर, धर्म वापसी कराई गई।
मुद्दा बड़ा और गंभीर है। बीजेपी ने फिर धर्मांतरण पर कड़े कानून बनाने की पहल का दावा किया तो कांग्रेस ने इसे सीधे-सीधे सरकार का फेलुअर। कांकेर के 14 गांवों ने तय कर लिया है कि उनके गांवों में पास्टर, पादरियों और धर्मांतरित लोगों के प्रवेश पर रोक होगी, तो वहीं छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने ग्राम सभाओं के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर साफ कर दिया है कि जबरन या प्रलोभन से धर्मांतरण रोकने के लिए लगाए गए बोर्ड असंवैधानिक नहीं हैं,
साफ है एक तरफ हैं धर्मांतरण के बाद छत्तीसगढ़ के वनांचल वाले ग्रामों में बनती वर्ग संघर्ष की स्थिति तो दूसरी तरफ है। धर्मांतरण के खिलाफ एक जुट होता आदिवासी समाज और तीसरी तरफ सैंकड़ों लोगों का घर वापसी अभियान सवाल ये है कि अगर धर्मांतरण जबरन या लालच देकर नहीं हो रहा तो सर्व समाज में ये गुस्सा क्यों घर वापसी की कतार में सैंकड़ों परिवार कैसे सवाल कड़े कानून के इंतजार पर भी है?

