Sunday, January 25, 2026
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छतौद में श्रीमद् भागवत कथा का छठा दिन:महारास, कंस वध और रुक्मिणी विवाह का हुआ सुंदर मंचन

श्रीकृष्ण और रुकमणी का विवाह हुई अमृत वर्षा .मड़प में बाराती बनकर नाचा पूरा गांव

तिल्दा-नेवरा-तिल्दा के ग्राम छतौद में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के छठवे दिन बड़ी संख्या में भागवत भक्त उमड़े। कथा व्यास महाराज गौरव जोशी ने भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य रासलीला, मथुरा गमन, कंस वध और अंत में रुक्मिणी विवाह का प्रसंग सुनाकर श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया।

महाराज श्री ने कथा के प्रारंभ में ‘रास पंचाध्यायी’ का वर्णन करते हुए कहा कि “रास कोई साधारण नृत्य नहीं, बल्कि जीवात्मा का परमात्मा से मिलन है।”महाराज ने कथा का शुभारंभ करते हुए गोपीजनों के साथ भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला का विस्तृत वर्णन किया। उन्होंने बताया कि रास जीव का परब्रह्म ईश्वर के साथ मिलन की कथा है, जो आस्था और विश्वास से भगवत प्राप्ति का फल देती है।इस  दौरान भगवान श्रीकृष्ण, राधा रानी और गोपियों द्वारा प्रस्तुत रासलीला की अत्यंत मनमोहक झांकी प्रस्तुत की गई । गोपियों के साथ भगवान के नृत्य से कथा स्थल वृन्दावन बन गया .

इसके पश्चात कथा में अक्रूर जी का आगमन हुआ  भगवान का मथुरा जाना और अत्याचारी कंस के वध का प्रसंग सुनाया गया। महाराज ने बताया  कि भगवान ने कंस को मारकर यह संदेश दिया कि अधर्म चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंत में जीत धर्म की ही होती है. कथा में  महर्षि संदीपनी के आश्रम में विद्या ग्रहण, कालयवन वध, उद्धव-गोपी संवाद, उद्धव द्वारा गोपियों को गुरु बनाना,जैसे प्रसंग सुनाए ..महारास के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने बांसुरी बजाकर गोपियों का आह्वान किया, जिससे जीवात्मा और परमात्मा का मिलन हुआ। उन्होंने स्पष्ट किया कि जीव और ब्रह्म के इस मिलन को ही महारास कहा जाता है।द्वारका की स्थापना और रुक्मिणी विवाह जैसे प्रसंगों का संगीतमय एवं भावपूर्ण पाठ किया गया।

रुकमिणी विवाह की भव्य झांकी

कथा का समापन भगवान श्रीकृष्ण और माता रुक्मिणी के विवाह से हुआ। द्वारिकाधीश की भव्य बारात निकाली गई। मंच पर दूल्हा-दुल्हन के रूप में भगवान की सजीव झांकी सजाई गई थी, जहाँ विधि-विधान से वरमाला और विवाह संपन्न हुआ।
​बाराती बनकर झूमा वर्मा परिवार:
विवाह प्रसंग के दौरान पंडाल में उत्सव का माहौल था। निधि और पूरे वर्मा परिवार ने घराती और बाराती बनकर रस्में निभाईं। जैसे ही भगवान की वरमाला हुई, श्रद्धालुओं ने फूलों की वर्षा की। ढोल-नगाड़ों और भजनों की धुन पर महिलाओं और युवाओं ने जमकर नृत्य किया।कल कथा का सातवां दिन होगा, जिसमें सुदामा चरित्र और परीक्षित मोक्ष की कथा सुनाई जाएगी।

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