Friday, January 23, 2026
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राजा परीक्षित और शुकदेव की कथा की सीख:हमारे पास समय सीमित है,उसका सर्वोत्तम उपयोग करें;स्वामी इंदुभवानंद

तिल्दा नेवरा

तिल्दा के सरोरा ग्राम गोसदन मे मां शीतला मंदिर प्रांगण में चल रहे श्री मद्भागवत कथा के तीसरे दिन दण्डी स्वामी इंदुभवानंद तीर्थ ने कहा लोगों की रात सोने में और भोग में बीत जाती है और दिन धन कमाने में ऐसे ही जीवन व्यर्थ चला जाता है। बुद्धिमान मनुष्य को हर समय भगवान के नाम, रुप, लीला और धाम के जप, ध्यान, चिंतन और धामवास के द्वारा जीवन को सफल बनाना चाहिए। हमेशा भगवान के नाम का जाप करें भगवान की कथा सुने। जो भगवान का नाम लेकर मर जाते हैं उनका कल्याण हो जाता है।.

कथा में स्वामी ने राजा परीक्षितऔर शुकदेव की कथा के साथ वामन अवतार  ध्रुव जी के चरित्र का सुन्दर वर्णन करते बताया की हस्तिनापुर के सम्राट राजा परीक्षित धर्म, सत्य और भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे। एक दिन राजा परीक्षित जी ने परमहंस श्री शुकदेव जी से पूंछा कि जो मरने वाला है उसे क्या करना चाहिए ? परमहंस श्री शुकदेव जी ने कहा कि मैं समाधि में था भगवान के गुणों ने मेरे मन को खींच लिया और मैं समाधि छोड़कर भागवत पढ़ने लगा। तुम भी भगवान की कथा सुनो, उनके नाम का जाप करो रुप का ध्यान करो तुम्हारे पास तो सात 7 दिन है राजा परीक्षित को ऋषि शृंगी से शाप मिला था कि सातवें दिन तक्षक नाम का सर्प उन्हें डंस लेगा और उनकी मृत्यु हो जाएगी। मृत्यु निश्चित थी और समय भी सीमित था।

इस कठिन समय में उन्होंने दुखी होने या डरने की बजाय आत्मज्ञान प्राप्त करने का मार्ग चुना। परीक्षित ने तय किया कि वे अपने शेष जीवन में शुकदेव जी से श्रीमद्भागवत कथा सुनेंगे, ताकि उन्हें ये समझ आ सके कि मृत्यु के बाद आत्मा का क्या होता है और जीवन का अंतिम लक्ष्य क्या है।परीक्षित शुकदेव जी के पास पहुंचे और श्रीमद् भागवत कथा सुनाने की प्रार्थना की। शुकदेव जी ने परीक्षित की प्रार्थना स्वीकार की और कथा सुनाना शुरू किया।इस प्रसंग की सीख ये है कि हमारे पास समय सीमित है, उसका सर्वोत्तम उपयोग करना चाहिए। जिज्ञासा रखें, प्रश्न करें, लेकिन उत्तर पाने के लिए मन खोलना चाहिए।

कुंती स्तुति का वर्णन करते हुए कहा कि माता कुंती ने दुःख मांगा क्योंकि दुख में भगवान साथ रहते हैं अर्थात माता कुंती ने भगवान का साथ मांगा है भगवान से कहती हैं कि मेरा मन परिवार से हटकर आपके चरणों में लगे। पितामह भीष्म जी ऐसे महाभागवत हैं जिन्हें दर्शन देने भगवान स्वयं गये भगवान की स्तुति करते दर्शन करते रास का स्मरण करते भगवान में लीन हो गए। ब्रह्मा जी के भौं से रुद्र उत्पन्न हुए जो दुष्टों को रुलाये वो रुद्र हैं। ब्रह्मा जी के नाक से भगवान श्री वराह का अवतार हुआ जिन्होंने पृथ्वी का उद्धार किया और हिरण्याक्ष का वध करके तार दिया। वराह अवतार की कथा सुनने से ब्रह्महत्या जैसे पाप नष्ट हो जाता है।
ध्रुव जी के चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि ध्रुव जी की विमाता सुरुचि ने अपमान किया था माता सुरुचि की प्रेरणा से तपस्या कर भक्त ध्रुव जी के भगवान श्री विष्णु जी का दर्शन किया। इस कथा के माध्यम से शिक्षा मिलती है कि वह अपमान भी धन्य है जो भगवान से जोड़ दे। शाम को भगवान की आरती में डी डी अग्रवाल सपरिवार शामिल हुए इस मुके पर  मंदिर समिति के सदस्य गण और ग्राम वासियों ने माल्यार्पण कर स्वागत किया।
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