Friday, January 23, 2026
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सच्ची शरणागति और हृदय से निकली पुकार ही हमें भवसागर से पार लगा सकती है:स्वामी इंदुभवानंद

तिल्दा नेवरा -तिल्दा के सरोरा ग्राम गोसदन में शीतला मंदिर प्रांगण में चल रहे श्री मद्भागवत कथा के चौथे दिन कथा वाचक दण्डी स्वामी इंदुभवानंद तीर्थ ने कहा जब सभी भौतिक शक्तियाँ निष्फल हो जाती हैं, तब केवल सच्ची शरणागति और हृदय से निकली पुकार ही हमें भवसागर से पार लगा सकती है।

स्वामी ने गज-ग्राह मोक्ष कथा कथा सुनाते हुए कहा कि क्षीरसागर के निकट स्थित त्रिकूट पर्वत पर एक विशाल, मनमोहक वन था। उस वन में गजेंद्र नामक एक पराक्रमी गजराज अपने झुंड के साथ रहता था। एक दिन, ग्रीष्मकाल की चिलचिलाती धूप से व्याकुल होकर गजेंद्र अपने झुंड के साथ एक विशाल सरोवर में जलक्रीड़ा करने पहुँचा।जब गजेंद्र और उसके साथी जल का आनंद ले रहे थे, तभी अचानक एक शक्तिशाली ग्राह (मगरमच्छ) ने गजेंद्र का पैर पकड़ लिया। ग्राह भी अपने पूर्व जन्म के कर्मों के कारण अत्यंत बलशाली था। गजेंद्र ने अपनी पूरी शक्ति लगाकर ग्राह से स्वयं को छुड़ाने   पूरा बल लगाकर ग्राह से जूझता रहा। गजेंद्र की शारीरिक शक्ति क्षीण होने लगी। उसके साथी हाथी भी छोड़कर चले गए। जब गजेंद्र ने देखा कि उसका अपना बल, उसका परिवार, कोई भी उसे इस संकट से नहीं निकाल सकता, उसे समझ आया कि इस भौतिक संसार में कोई भी शक्ति भगवान से बड़ी नहीं है। गजेंद्र ने अपनी सूंड में एक कमल का फूल उठाया और उसे आकाश की ओर उठाकर, अत्यंत करुण स्वर में आदि नारायण भगवान विष्णु का आह्वान किया। प्रभु मेरी रक्षा करो! गजेंद्र की पुकार को सुन भगवान विष्णु वैकुण्ठ से गरुड़ पर सवार होकर तुरंत प्रकट हुए। भगवान ने तत्काल अपने सुदर्शन चक्र का प्रयोग कर ग्राह का वध कर दिया और गजराज को पीड़ा से मुक्त किया। ग्राह अपने लोक चला गया और गजेंद्र भगवान के साथ भगवान के धाम चले गए। यह संसार ही सरोवर है गज जीव है ग्राह काल है जो भगवान के शरण चला जाता है वह मोक्ष और भगवान के धाम को प्राप्त कर लेता है।

स्वामी ने समुंद्र मंथन की कथा सुनाते हुए कहा कि विचारों का मंथन समुद्र मंथन है जिसमें वासना रूपी विष भी निकलता है और सद्विचार रुपी अमृत। जो भगवान के शरण में रहता है उसे सफलता मिलती है और जो भगवान से विमुख रहता है उसे मेहनत करने के बाद भी सफलता नहीं मिलती।भगवान श्रीहरि ने देवताओं का कार्य बनाने के लिए समुंद्र मंथन करवाया। समुंद्र मंथन से 14 रूप प्रकट हुए उसमें से उच्चेश्वर घोड़ा, दैत्यराज बलि, ऐरावत हाथी, देवराज इंद्र को कौस्तुभ मणि भगवान ने अपने वक्ष स्थल पर धारण कर कल्प वृक्ष स्वर्ग में स्थापित किया और हलाहल विष जिसके कारण त्रिलोकी में हाहा कर मचने लगा। उसे भगवान शंकर ने पान कर अपने कंठ में धारण किया और अंत में समुंद्र मंथन अमृत प्रकट हुआ, जिसका पान देवताओं को करवाया।

वेदों की रक्षा के लिए भगवान का मत्स्यावतार हुआ था। ब्राह्मणों के आशीर्वाद से जब राजा बलि का स्वर्ग में अधिकार हो गया तब देवमाता अदिति ने पयोव्रत किया भगवान श्री विष्णु जी प्रकट हो गए और बोले कि मैं तुम्हारी आराधना से प्रसन्न हुं मेरी आराधना कभी व्यर्थ नहीं जाती। अभी ब्राह्मणों का और गुरु का आशीर्वाद प्राप्त है इसलिए अभी लड़कर नहीं मांग कर काम बनाऊंगा। भगवान् वामन अवतार लिए और तीन पग भूमि दान में मांगकर देवताओं का काम बना दिया। राजा बलि कहते हैं कि सत्पात्र को दान करने वाला बहुत कठिनाई से मिलता है।स्वामी जी ने कथा में कृष्ण जन्म का वर्णन होने पर समूचा पांडाल खुशी से झूम उठा। मौजूद श्रद्धालु भगवान कृष्ण के जै जै कार के साथ झूमकर कृष्ण जन्म की खुशियां मनाई। कथा सुनने गांव सहित आसपास गांव से बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हो रहे हैं।

कथा वाचिक ने भारतवर्ष में हो रही गौमाता की दुर्दशा पर दुख व्यक्त करते हुए कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में माता-पिता, गरीब एवं वृद्धजनों की तथा गौमाता की निस्वार्थ भाव से सेवा करनी चाहिए। आज हिंदू समाज सनातन संस्कृति को छोड़कर निरंतर गौमाता का तिरस्कार कर रहा है जो कि काफी दुखद बात है। हमें हमारी सनातन संस्कृति को जीवित रखना है।परम पूज्य शंकराचार्य जी के आश्रम रायपुर में देशी गौवंश की सेवा के लिए रामा गौशाला बन रहा है वहां गौ वंश की सेवा चल रही है जो भी भक्तगण गौमाता की सेवा करना चाहते हैं वो शंकराचार्य आश्रम रायपुर गौशाला में दान करके अपना कल्याण कर सकता है। गौशाला में दान करने के लिए 7987344179 इस नंबर में संपर्क कर सकते हैं। या सिधे शंकराचार्य आश्रम जाकर भी दे सकते हैं।

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