तिल्दा नेवरा-तिल्दा के ग्राम सरोरा गोसदन माँ शीतला मंदिर प्रांगण चल रहे श्रीमद भागवत कथा के दुसरे दिन कथा वाचक दंडी स्वामी इंदुभवानन्द तीर्थ महराज ने श्रोताओ को कथा रसपान कराते धुंधकारी की कथा का वर्णन किया। महराज ने आत्मदेव ब्राह्मण और उनकी दुष्ट पत्नी धुंधली तथा उनके पुत्रों गोकर्ण व धुंधकारी के जीवन का वर्णन करते बताया कि कैसे दुष्टता से दुख आता है और भागवत कथा के श्रवण से ही मोक्ष मिलता है, जिसमें देवर्षि नारद और भगवान विष्णु के संवाद कि कथा का बखान किया,

धुंधकारी कथा में बताया कि तुंगभद्रा नदी के किनारे आत्मदेव नामक ब्राह्मण अपनी दुष्ट पत्नी धुंधली के साथ रहते थे। वे निःसंतान थे और दुखी रहते थे।एक ऋषि के आशीर्वाद से धुंधली गर्भवती हुई, लेकिन उसने फल अपनी बहन को दे दिया। बाद में, धुंधली ने अपनी बहन के बच्चे (धुंधकारी) को पाला, जो बड़ा होकर दुष्ट और अत्याचारी बन गया। धुंधकारी ने अपने पिता और भाई (गोकर्ण) को कष्ट पहुँचाया, और उसकी माता धुंधली भी उसके अत्याचारों से तंग आकर आत्महत्या कर लेती है। धुंधकारी को मुक्ति नहीं मिली। तब विद्वानों की सलाह पर सूर्य देव ने बताया कि उसे भागवत कथा सुनने से ही मोक्ष मिला .देवर्षि नारद द्वारा मृत्युलोक के प्राणियों के दुख दूर करने का उपाय पूछने और भगवान विष्णु द्वारा भागवत कथा का महत्त्व बताने का प्रसंग बताया.
स्वामी जी ने कहा यह कथा बताती है कि कैसे कलियुग में मनुष्य अपने कर्मों से दुखी होते हैं और भागवत कथा के माध्यम से इन दुखों का अंत होता है। शुकदेव जन्म कथा के अनुसार, शुकदेव जी महर्षि वेद व्यास के अयोनिज (गर्भ से भिन्न) पुत्र हैं, जिनका जन्म एक तोते के रूप में अमर कथा सुनते हुए हुआ; पार्वती जी के निद्रा में होने के कारण, शिव जी से बचने के लिए वह तोता व्यास जी की पत्नी के मुख से गर्भ में समा गया और बारह वर्ष बाद माया के प्रभाव से मुक्ति मिलने पर उन्होंने जन्म लिया, जो व्यास जी के पुत्र कहलाए और जन्म से ही ज्ञानी थे।
भगवान शिव ने माता पार्वती को अमर कथा सुनानी शुरू की। शिव जी ने डमरू बजाया ताकि कोई और न सुन पाए, लेकिन एक तोता (शुक) पास ही एक सूखे पेड़ पर बैठा था और वह कथा सुनने लगा।
पार्वती जी को नींद आ गई, लेकिन तोते ने ‘हूंकार’ भरते हुए कथा सुनी। जब शिव जी को यह पता चला तो वे क्रोधित होकर उसे मारने दौड़े। जान बचाने के लिए वह तोता तीनों लोकों में भागा और अंत में व्यास जी के आश्रम में पहुंचा। वहां सूक्ष्म रूप धारण कर वह व्यास जी की पत्नी के मुख से उनके गर्भ में समा गया।
वह तोता, जो अब शुकदेव था, बारह वर्षों तक गर्भ में रहा। जब भगवान श्रीकृष्ण ने आकर उसे आश्वासन दिया कि बाहर आने पर माया का प्रभाव नहीं पड़ेगा, तब शुकदेव जी गर्भ से बाहर निकले और महर्षि वेद व्यास के पुत्र कहलाए।
जन्म लेते ही शुकदेव जी को समस्त वेदों, उपनिषदों और पुराणों का ज्ञान था। संसार से विरक्त होने के कारण वे जन्म के बाद ही तपस्या के लिए वन की ओर भागने लगे, जिन्हें व्यास जी ने बाद में श्रीमद्भागवत कथा सुनाई ।
इस प्रकार, शुकदेव जी का जन्म एक दैवीय घटना थी, जिसके कारण वे जन्म से ही ब्रह्मज्ञानी और भगवान के प्रिय भक्त कहलाए।आज स्वामी जी ने सुमधुर भजन व विभिन्न प्रसंगो को सुनाकर भक्तो को भाव बिभोर कर दिया

