
इंदर कोटवानी
तिल्दा नेवरा-मैं शहर का हूं सबसे पुराना तालाब…. पहचान ? दीनदयाल चौक से हाई स्कूल रोड के किनारे दलाल तरिया के नाम से जाना जाता हु..। करीब 100 साल से इस शहर के जीवन को पानीदार बनाने की कोशिश करने वाला। नई पीढ़ी को तो शायद पता भी नहीं होगा कि मैं कभी भरा पूरा तालाब था।.. बहुत बड़ा। उन्होंने तो मुझे पोखर के रूप में ही देखा है जमीन के जादूगरों की नजरें जब से मुझ पर पड़ी है.. मेरी तो जैसे किस्मत ही बिगड़ गई. अपना पानी खो चुके इन लोगों को मेरा पानी कभी रास नहीं आया, उन्होंने एक तो बहुत पहले से ही पानी के अंदर छुपी जमीन में अपनी लालच के बीज बोने शुरू कर दिए थे।

आप यकीन नहीं करेंगे कि मैं 4 एकड़ से भी ज्यादा जमीन पर फैला हुआ था। स्वर्गीय विधायक श्याम सुंदर अग्रवाल. स्वर्गीय एक दरोगा का परिवार के मवेशी मेरा पानी पिया करते थे। धीरे-धीरे शहर की आबादी बढ़ी बाद में सभी इस तालाब का उपयोग करने लगे ।मैं सबका हो गया सबको अपने आंचल में समा लेने की प्रकृति है मेरी। सब कुछ ठीक चल रहा था।लेकिन तभी कुछ शहर के ताकतवर लोगों की मेरे ऊपर ऐसी नजर पड़ी की.मेरा वजूद मिटने लगा । स्केटबोर्ड मेरे बुरे दिन शुरू हो गए मेरी देखरेख करने वालों ने मेरा सौदा करना शुरू कर दिया कैसे सार्वजनिक उपयोग होने के बावजूद में किसी की मिल्कियत हो गया कैसे जमीन किसी के नाम चडगई कैसे तालाब शब्द ही गायब हो गया कैसे उसे किसी ने खरीद लिया फिर कैसे बेच दिया यह कोई नहीं बताता हां फायदा सबने काम आया लेकिन इतने भर से पेट नहीं भरा तो मेरे जिंदा शरीर पर मिट्टी डालना शुरू कर दी मिट्टी के थोड़ा सख्त होते ही प्लाट काटना शुरू कर दिया बिल्डिंग बनाने लगी ….और यह लगातार जारी है.।
सब के पास अपने-अपने तर्क हैं और अपनी-अपनी सफाई लेकिन यह सत्य है कि मैं दफन किया जा रहा हूं धीरे-धीरे। मेरे चाहने वाले इस बात की शिकायत लेकर अफसरों को पास गए. जनप्रतिनिधियों के पास गए. लेकिन किसी का “पानी” नहीं जागा। तहसीलदार और एसडीएम कहते जरूर है कि जो हुआ और हो रहा है वह गलत है। तालाब को तालाब ही रहने दिया जाए। मगर भू माफियाओं ने इसे अनसुना कर दिया। मिलीभगत वाले जनप्रतिनिधियों द्वारा भी..। मेरे सीने पर लगातार मिट्टी डाली जा रही है…।मैं 4 एकड़ से सिमटता-सिमटता आधा हो चुका हूं ….मैं तिल-तिल मर रहा हूं..।किसके आगे अपनी व्यथा कहूं। लेकिन चुप भी कब तक रहूं।
छतीसगढ़ के लोग कहते हैं… कका अभी जिंदा हे…. भूपेश है तो भरोसा है..।इसीलिए कुछ उम्मीद लगाकर बोल रहा हूं ।मुझे मेरा स्वरूप लौटा दो । मुझे मेरा पानी लौटा दो। ध्यान रखो, यदि खरी-खरी बोलने लगूंगा तो अच्छे-अच्छे की बोलती बंद हो जाएगी…..।