बीजापुर नक्सली हमला: हवाओं में बारूद की गंध, न मोबाइल में नेटवर्क और चारों सन्नाटा, अंबेली में IED ब्लास्ट के बाद कैसा मंजर?

वीसीएन टाइम्स
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बीजापुर:छत्तीसगढ़ के अम्बेली गांव में माओवादियों  के द्वारा किए गए IED ब्लास्ट शहिद हुए   आठ सुरक्षाकर्मी और एक ड्राइवर इस घटना ने साल्वा जुडूम आंदोलन की याद को तजा कर दिया है, जो 2004 में इसी गांव से साल्वा जुडूम आंदोलन शुरू हुआ था। गांव में अभी भी राहत शिविर चल रहे हैं, जहां माओवादियों द्वारा प्रताड़ित लोग रहते हैं। माओवादियों ने इस जगह को इसलिए चुना क्यों कि यहां मोबाइल नेटवर्क नहीं है। ब्लास्ट इतना जबरदस्त था कि 8 से 10 फुट गहरा गड्ढा बन गया।

इस घटना को अंजाम देने माओवादियों ने लगभग 60 किलो विस्फोटक इस्तेमाल किया। ड्राइवर का शरीर पूरी तरह से क्षत-विक्षत हो गया था। माओवादी अब IED ब्लास्ट का सहारा ले रहे हैं क्योंकि वे सीधी लड़ाई में हार रहे हैं। सुरक्षाबलों के पास IED का पता लगाने के सीमित संसाधन हैं। माओवादी इसका फायदा उठाते हैं और जवानों की छोटी सी भी गलती का फायदा उठा लेते हैं। ऐसा माना जा रहा है कि यह कमांड IED था। घटनास्थल के पास कटे हुए तार मिले हैं। एक बड़ा पेड़ भी है, जिसके पीछे छिपकर माओवादियों ने धमाका किया होगा।

अंबेली गांव, जो कभी साल्वा जुडूम आंदोलन का केंद्र था, एक बार फिर हिंसा की चपेट में आ गया है। गांव में विस्फोटकों की गंध अभी भी हवा में है, जो उस भयावह इतिहास की याद दिलाती है, जब यहां साल्वा जुडूम आंदोलन शुरू हुआ था। स्थानीय लोग बाहरी लोगों से बात करने से कतरा थे । घटनास्थल पर गाड़ियों के टुकड़े, जवानों के जूते और जले हुए सामान बिखरे पड़े हैं।

बताया जाता है की जब साल्वा जुडूम आंदोलन शुरू हुआ था, तब वह बहुत छोटा था। गांव में अभी भी राहत शिविर चल रहे हैं, जहां माओवादियों द्वारा प्रताड़ित लोग रहते हैं

DGP अशोक जुनेजा, बस्तर IG पी सुंदरराज, CRPF कमांडो, बीजापुर SP जितेंद्र यादव की टीम ने घटनास्थल का दौरा किया। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि माओवादियों ने अम्बेली गांव को इसलिए चुना होगा क्योंकि यहां मोबाइल नेटवर्क पूरी तरह से बंद रहता है। DIG कमलोचन कश्यप ने भी घटनास्थल का दौरा किया। उन्होंने कहा कि SOP के पालन में हुई चूक की समीक्षा की जा रही है। ऐसी गलतियां दोबारा न हों, इसके लिए प्रयास किए जाएंगे।

एक स्थानीय पत्रकार के अनुसार, विस्फोट स्थल पर 8 फुट गहरा गड्ढा विस्फोट की गंभीरता को दर्शाता है। फॉरेंसिक टीम का अनुमान है कि माओवादियों ने 60 किलो से ज्यादा विस्फोटक लगाया था। विस्फोट वाली जगह पर सीमेंट कंक्रीट की सड़क थी, जिसमें अब कई जगह दरारें आ गई हैं। शुरुआत में ड्राइवर लापता बताया गया था, लेकिन बाद में पता चला कि उसका शरीर पूरी तरह से क्षत-विक्षत हो गया था।

एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि सुरक्षाबलों से सीधी लड़ाई में बार-बार हार का सामना करने के बाद, माओवादियों ने एक बार फिर IED ब्लास्ट को अपना मुख्य हथियार बना लिया है। बस्तर में इस तरह की घटनाएं आम हैं, जहां माओवादी छिपकर सही मौके का इंतजार करते हैं। ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए जवानों को SOP का सख्ती से पालन करना ज़रूरी है।

वहीं, एक अन्य अधिकारी ने कहा कि IED नक्सलियों का मुख्य हथियार है। बलों के पास इन्हें खोजने के सीमित संसाधन हैं, जो हमेशा प्रभावी नहीं होते। माओवादी इसका फायदा उठाते हैं और जवानों की छोटी सी भी गलती का फायदा उठा लेते हैं

घटनास्थल पर मौजूद अधिकारियों का मानना है कि माओवादियों ने कमांड IED का इस्तेमाल किया था। विस्फोट स्थल के आसपास हाल ही में कटे हुए बिजली के तारों के निशान मिले हैं। पास में एक बड़ा पेड़ है, जिससे पता चलता है कि माओवादी इसके पीछे छिपकर कमांड IED को विस्फोट कर रहे थे। यही कारण है कि सुरक्षाबलों को इतना नुकसान हुआ।

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