बिलासपुर-हाईकोर्ट ने पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के निलंबित ज्वॉइंट डायरेक्टर अशोक चतुर्वेदी की याचिका खारिज कर दी है। उन्होंने एसीबी की ओर से दर्ज आय से अधिक संपत्ति के केस को निरस्त करने के लिए याचिका लगाई थी।केस की सुनवाई के दौरान एसीबी ने बताया कि सेवाकाल के दौरान अफसर की कुल आय 68 लाख रुपए थी, जबकि उनसे 31 करोड़ की चल-अचल संपत्ति के दस्तावेज और सबूत मिले हैं।
पंचायत एवं ग्रामीण विभाग के जॉइन डायरेक्टर अशोक चतुर्वेदी के खिलाफ एसीबी ने आय से अधिक संपत्ति का केस दर्ज किया है। इससे पहले एसीबी ने उनकी संपत्ति की जांच की थी, जिसके बाद उनके ठिकानों में छापेमारी भी की थी।जांच के बाद 28 अगस्त 2023 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(बी) और 13(2) के तहत अंतिम रिपोर्ट दाखिल की। यह मामला विशेष न्यायाधीश (पीसी एक्ट), रायपुर की अदालत में ट्रायल पर है।
आरोपी अफसर के खिलाफ साक्ष्य मिलने पर राज्य शासन ने उसे सस्पेंड कर दिया है। इसके साथ ही एसीबी की टीम उसकी तलाश भी कर रही थी। इस बीच आरोपी अफसर ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी। इसमें अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को निरस्त करने की मांग की गई थी। इस मामले में हाईकोर्ट ने नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।
याचिकाकर्ता की तरफ से कहा गया कि उनका रिकॉर्ड साफ है। वह जांच का सामना करने को तैयार है। आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने राजनीतिक दुर्भावना के कार्रवाई की थी। पत्नी को FIR में आरोपी नहीं बनाया गया था। लेकिन अंतिम रिपोर्ट में शामिल किया गया है। यह भी कहा गया कि बिना वैध पूर्व स्वीकृति के रिपोर्ट दाखिल की गई, जो कानून के खिलाफ है।कोर्ट में जवाब प्रस्तुत कर राज्य सरकार ने बताया कि FIR के अनुसार अधिकारी की सेवा अवधि यानी 3 मार्च 2001 से 31 दिसंबर 2019 तक कुल वेतन 68 लाख 89 हजार 344 रुपए रहा। पत्नी की आय 23 लाख 60 हजार 845 रुपए बताई गई है।
जबकि जांच एजेंसी के अनुसार दोनों के पास 31 करोड़ 65 लाख 82 हजार 400 रुपए की संपत्ति है। इसमें छह संपत्तियों का विवरण दिया गया है। इनमें से एक संपत्ति ग्राम तेंदुआ, तहसील नवागढ़ में है।इसकी कीमत 1 करोड़ 10 लाख रुपए आंकी गई है। इसमें 30 लाख भूमि और 80 लाख कथित विकास कार्य के लिए बताए गए हैं। इसके अलावा अधिकारी ने बीमा पॉलिसियों में 22 लाख 31 हजार 47 रुपए और विविध खर्चों में 5 लाख 50 हजार रुपए का निवेश किया है।
मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप गंभीर हैं। आरोप-पत्र दाखिल हो चुका है। जांच को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाना जरूरी है। इस आधार पर हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी है।