
वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की खरी… खरी…
आत्ममुग्धता का सवाल, हो न कोई बवाल
देश में एक बहुत ही प्रचलित डायलाॅग है जो न सिर्फ भाजपा वाले कहते रहते हैं पर आम आदमी की जबान पर भी रहता है। जिसकी जबान पर नहीं होता उसकी सोच में रहता है। प्रायः हर देशवासी इसे स्वीकार करता है और वो डायलाॅग है ‘आएगा तो मोदी ही’। याने हर किसी को ये लगता है कि भविष्य भाजपा का है और 2024 में भाजपा आसानी से लोकसभा चुनाव जीत जाएगी और मोदीजी फिर से प्रधानमंत्री बन जाएंगे। जाहिर है ऐसे ही प्रबल भाव, ऐसी मजबूत सोच भाजपाईयों के मन में भी है। यानि कि सब हरा ही हरा दिख रहा है।
2004 का सीन
जीत का पक्का यकीन
अब ज़रा 20 साल पीछे चलिये। याद करिये सन् 2004। तब भी अटल बिहारी बाजपेई और अन्य वरिष्ठ भाजपा नेताओं को लगता था कि वे जीत रहे हैं। तब भाजपा के नजरिये से पूरा हिंदुस्तान चमक रहा था। तब के लीडर आसानी से जगमग-जगमग करते चेहरे लेकर जनता के बीच जाते थे और अपने कद से भी उंचा हाथ उठाकर ‘इंडिया शाईनिंग, इंडिया शाईनिंग’ के नारे लगाया करते थे। ये बड़े-बड़े लीडर आत्ममुग्ध थे और हवाई यात्राआंे से सांय-सांय सारे देश में घूमते फिरते थे। कहावत में नहीं सचमुच मंे उनके पांव जमीन पर नहीं पड़ते थे। वे आकाश में विचरण करते थे। स्व. प्रमोद महाजन ने सारे वातावरण को भाजपामय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
सारे देश और सारी दुनिया को ये यकीन था कि भारत मे भाजपा ही आ रही है वो भी शानदार तरीके से, निर्विवाद। माननीय अटलबिहारी बाजपेई के नेतृत्व में भारत फिर से चमकने-दमकने वाला है।

बहुतों को लगा झटका
जनता ने संसद के बाहर ला पटका
हुआ क्या ? हुआ ये कि इस जगमगाहट और चकाचैंध में जनता के दिल के किसी कोने में बसे अंधेरे को, निराशा को, तकलीफ को भाजपा के सीनियर लीडर भी नहीं भांप पाए और भाजपा उस सियासी खेल में बुरी हारी। बुरी हारी इसलिये कहा जा रहा है कि उसके जीतने की पचीस, पचास नहीं हण्ड्रेड परसेन्ट गैरेन्टी थी। इसे ही शायद आसमान से जमीन पर या अर्श से फर्श पर गिरना कहते हैं।
विश्व में मोदी नाम का डंका बज रहा है
देश में मोदी के लिये आसन सज रहा है
निश्चित रूप् से इस समय सारे विश्व में मोदी के नाम का डंका बज रहा है। दो देशों के प्रमुखों के बीच मिलने का एक प्रोटोकाॅल होता है। बोले तो…. एक अदब रहता है गंभीरता रहजी है। जो लीडर हाथ मिलाकर औपचारिक तौर तरीके से अतिथि का स्वागत करते हैं, वे बच्चांे की तरह भावुक होकर मोदी को गले लगाते हैं या हाथ पकड़कर उस पर दूसरा हाथ रखकर दोस्तों की तरह बतियाते हैं। और तो और भक्त की तरह पांव भी छू लेते हैं।
किसी की आंखों में मोदी के लिये असीम सम्मान और श्रद्धा का भाव दिखता है तो किसी का दिल उनके लिये करोड़ों दुआएं देता है। न सिर्फ राजनीतिक समझदारी, राजनीतिक उदारता बल्कि विश्व के हर देश को मदद करने की मानसिकता, अपने हों या पराए, दोस्त हों या दुश्मन हर किसी के साथ मानवीय व्यवहार और आगे बढ़कर सहयोग की जो उदार प्रवृति मोदीजी के अंदर है उसने उन्हे सारी दुनिया में बेपनाह प्रेम और सम्मान दिलाया है।
किसी भी मसले पर सारा विश्व मोदीजी की ओर देखता है कि उनका रूख क्या है। जिस तरफ जैसा वो चाहते हैं आमतौर पर विश्व मे भी वैसा ही वातावरण बन जाता है। ये बात देश का बच्चा-बच्चा जानता है, समझता है और इसमें कोई दो मत भी नहीं हैं कि राज्यों में चाहे भाजपा का मतदाता भाजपा को थोड़ा अंकुश में रख ले, लेकिन मोदीजी के प्रति जनता को एक अटूट विश्वास झलकता है। विधानसभा में चाहे वो किसी को भी जिताए पर लोकसभा में वो मोदी के नाम पर ही वोट करता है।
जनता से हो जुड़ाव
और जमीन पर हों पांव
बस यही वो आत्मविश्वास है जिससे भाजपा नेता खुद को गौरवान्वित समझते हैं। ये आत्मविश्वास कहीं अति आत्मविश्वास न बन जाए और नेता कहीं आत्ममुग्ध न हो जाएं। ध्यान रखना होगा कि ‘अति सर्वत्र वर्जयेत्’। ‘अति’ आत्मविश्वास इंसान को पराजित करा देता है। ये बात सारे नेताओं को समझनी होगी कि भाजपा कार्यकर्ता, भाजपा से जुड़े लोग और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ हमेशा तैयार रहते हैें और उन्हें उपर से जो निर्देश मिलते हैं वैसा वे करते हैं इसलिये सीधे तौर पर ये दायित्व बड़े नेताओं का ही है कि वे इन अनुकूल परिस्थितियों को, इस सुखद वातावरण को, पार्टी के आभामण्डल को और पार्टी की इस कामयाब छवि को कायम रखंे और इसे भुनाने में सफल हों।
कहीं कोई चूक न रह जाए। कहीं ऐसा न हो कि आत्मविश्वास के इस गुब्बारे में घमण्ड की सुई लग जाए और वह फुस्स हो जाए। हालांकि ये सोचना कि मोदीजी की सरकार नहीं बनेगी या भाजपा को लोकसभा में विजय नहीं मिलेगी, लगभग असंभव है। लेकिन जिस गति से भाजपा दौड़ती दिख रही है ऐसे में यदि भाजपा की कुछ सीटें अपेक्षा से कम आईं तो भी बेहद असुखद बात होगी। अगर ऐसा होता है तो साफ तौर पर वरिष्ठ लीडरों के दिमाग में अति आत्मविश्वास के चलते ही होगा।
जीत का यकीन
संघर्ष को शिथिल कर देता है
जब इंसान को सफलता सामने नजर आने लगती है तो वो लापरवाह हो जाता है। जब उसे ये यकीन हो जाता है कि बस जीत उसका आलिंगन करने वाली है तो उसके जीत के प्रति जुनून में शिथिलता आ जाती है। बस ये नहीं होना चाहिये। देश उम्मीद कर रहा है कि मोदी और शाह की जोड़ी पार्टी के अंदर ऐसी किसी संभावित जीत के यकीन से उपजी शिथिलता से अपने कुनबे को दूर ही रखेंगे।