तिल्दा नेवरा- तिल्दा के ग्राम सरोरा गोसदन श्रीमदभागवत महामात्य की कथा के साथ माँ शीतला मंदिर प्रांगण में भागवत कथा की शुरुवात हुई । कथा के प्रथम दिन दंडी स्वामी डॉ इंदुभवानन्द गिरी महराज श्रीमद्भागवत महापुराण के महिमा और महत्व का वर्णन करते हुए बताया की भागवत कथा ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का दिव्य ग्रंथ है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं और अवतारों का वर्णन है, और कलियुग में इसके श्रवण से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट होकर मोक्ष प्राप्त होता है. यह कथा ब्रह्मा जी द्वारा नारद जी को, फिर व्यास जी को और अंत में परीक्षित महाराज को सुनाई गई थी, जो भक्तों को सांसारिक दुखों से निकालकर परम आनंद की ओर ले जाती है.
स्वामी ने भागवत माहात्म्य कथा का सार में बताया की ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का संगम है, जिसमें भगवान नारायण (श्रीकृष्ण) के अवतारों और लीलाओं का वर्णन है. अन्य युगों में मोक्ष के लिए कठोर तपस्या करनी पड़ती थी, लेकिन कलियुग में भागवत कथा सुनने मात्र से व्यक्ति भवसागर पार कर सकता है और सोया हुआ ज्ञान जागृत हो जाता है. ब्रह्मा जी से नारद जी, नारद जी ने व्यास जी और परीक्षित महाराज को सुनायाऔर सूत जी ने शौनकादि ऋषियों को सुनाया.
यह कथा ‘सत्-चित्-आनंद’ स्वरूप भगवान का वर्णन करता है, जिससे जुड़कर व्यक्ति दुखों से मुक्ति पाकर आनंदमय हो सकता है. कथा श्रवण से जन्म-जन्मांतर के विकार दूर होते हैं, आध्यात्मिक विकास होता है, और यह आत्मा को ईश्वर से जोड़कर मोक्ष प्रदान करती है. घर पर कथा करने के लिए संकल्प लेना होता है, जिसे सात दिन, सात महीने या सात एकादशियों में पूरा किया जा सकता है. स्वामी ने कहा इसके नियम और विधि के लिए किसी योग्य ब्राह्मण से मार्गदर्शन लेना चाहिए. श्रीमद् भागवत माहात्म्य कथा स्वयं में एक आध्यात्मिक यात्रा है, जो भक्तों को भगवान से जोड़कर जीवन का सच्चा अर्थ समझाती है और परम आनंद की प्राप्ति कराती है.

